सम्यग् विवेचितं ग्रन्थानुसारं ब्राह्मणत्वम् गौड-द्राविडत्वं पूर्वं तावद् द्विविधत्वम्।
महाभारतेपि ब्राह्मणविषयत्वं विवेचितं द्रष्टव्यं तत्रैव।
तत्र विवेचने कर्माधारत्वं वर्णितम्।वनपर्वणि तत्र आजगरपर्वणि180तमाध्याये सर्पयोनौ नहुषस्य राज्ञः युधिष्ठिर-मध्ये वार्ताक्रमः ।
सर्प उवाच
ब्राह्मणः को भवेद् राजन्
वेद्यं किं च युधिष्ठिर।
ब्रवीहि अतिमतिं त्वां हि
वाक्यैः अनुमिमीमहे।।20।।
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं दानं क्षमा शीलम्
आनृशस्यं तपोघृणा।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र
स ब्राह्मण इति स्मृतः।।21।।
वेद्यं सर्वं परं ब्रह्म
निर्दुःखम् असुखं च यत्
यत्र गत्वा न शोचन्ति
भवतः किं विवक्षितम्।।22।।
शूद्रे तु यद् भवेल् लक्ष्यं
द्विजे तच्च न विद्यते।
न वै शूद्रः भवेत् शूद्रः
ब्राह्मणः न च ब्राह्मणः।।25।।
यत्रैतल् लक्ष्यते सर्वं वृत्तं
स ब्राह्मणः स्मृतः।
यत्रैतन् न भवेत् सर्प तं
शूद्रम् इति निर्दिशेत्।।26।।
यत्रेदानीं महासर्प!
संस्कृतं वृत्तम् इष्यते।
तं ब्राह्मणम् अहं पूर्वम्
उक्तवान् भुजगोत्तम।।37।।
अथ च
अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्व
तत्र 104तमाध्याये
ये न पूर्वाम् उपासन्ते
द्विजाः सन्ध्यां न पश्चिमाम्।
सर्वांस्तान् धार्मिकः राजा
शूद्रकर्माणि कारयेत्।।19।।
इत्यत्र महाभारम् अवश्यम्
अनुसन्धेयम्, ब्राह्मणविषये।
हरिः शरणम्
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Month: June 2025
देश को उबारो
पश्चिम का भोग भोगी सर्प जब डंसता है।
भारत का योग आकर यहीं तो फंसता है।।
सहशिक्षा समानता ने कहीं का नहीं छोड़ा है।
भौतिकता की अन्धी दौड़ बड़ा भारी रोड़ा है।।
रही सही कमर तोड़ी मोबाइल का जमाना है।
हर अपराध फैलता है क्या कोई माना है।।
सारे सम्बन्ध टूटे भ्रान्त भोग काम ऊपर।
विषय भोग काम रोग मनुजीवन दूभर।।
कहां गयी सावित्री अनुसूया सीता है।
द्रौपदी न दीखती मेरी भी मति भीता है।।
आकर जगावो राम! देवसंस्कार जगे जागे।
भोग का कुयोग रोग अव्यवहित भागे।।
भेजो कबीर बीर उपनिषद् पुनः गाये।
साखी सबदी में सत्य गाकर सुनाये।।
चित्त प्रकृतिस्थ होवे अन्तर्हित चेतना में।
बुद्धि से विवेक होय राम नाम नामें।।
राजा राम रघुवंशी रावण को मारो।
सूर्पनखा सोनम से देश को उबारो।।
हरिगुरुसन्त: शरणम्
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प्रेमानंद
जब तक संसार के लायक बने रहेगो, भगवान् के लायक नहीं बन सकते।
यह मानवजीवन भगवान् की प्राप्ति हेतु है,संसार की प्राप्ति हेतु नहीं।
संसार में मन बुद्धि चित्त अहं की वृत्ति तो संसार में बारम्बार डालेगी।
जिस क्षण यह सत् चित् आनन्द, शरीर से पृथक् होगा, तब मन आदि की वृत्ति संसार में रहने से कर्मजाल के कारण संसार पुनः मिलना ध्रुव है।
अविलम्ब लौट आ, चल रे मन! अपने शाश्वत प्रेमी की और।
संसार के राग भोग पद प्रतिष्ठा में जो नहीं रमा,
वही कालिदास भारवि भास तुलसी कबीर रैदास बन कर शाश्वत पदवी पाया।
विचारो बुद्ध की मनीषा, मीरा का समर्पण जिसने ज्ञान भक्ति से अनन्त को स्वीकारा।
संसार में मनोरमता बन्धन है,जबकि भगवान् के नामरूपलीलागुणों में मनोरमता मुक्ति है।
शरणागति मुक्ति का उपाय भी है और उपेय भी।
सुमिरो कि प्राक्तन शरीर के संस्कार वश वेदादिक शास्त्र सुनाने सुनने का अवसर मिला। इस अवसर को क्यों गंवायें।
तुलसी बाबा
मति कीरति गति भूति भलाई।जो जेहिं जतन जहां जेहिं पाई।सो जानौ सत्संग प्रभाऊ।लोकहुं वेद न आने उपाऊ।।
कालिदास
व्यतिषजति पदार्थानान्तर: कोपि हेतु:। न खलु वहिरुपाधीन् प्रीतय: संश्रयन्ते।
बाहर की ओढ़ी गई मायिक संसारी उपाधियां, वास्तव प्रेम का कारण नहीं। वह कोई अन्तर तत्व सत्व है जिससे समस्त पद पदार्थ प्रीति प्रेय हैं।
शाश्वत प्रेमी भरपूर कंद।
है जहां रहे वह प्रेमानंद।
हरिगुरुसन्त: शरणम्
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