गुरुपदहिं रमै मन विकल विकल

इतना तो कम नहीं कि मन श्रीअवध विरज रज बसा रहे।
जहं जहं श्रीगुरुचरण चलें तहं तहं की धूली धूसर धूरि गहे।।

सरयू गंगा यमुना पानी पीकर पवित्र होता तन मन।
होवे अभिराम राम सीता श्रीकृष्ण राधिका स्वत: स्मरन।।

इसमें अपनी करनी कहां सज्जनों यह गुरुकृपा प्राप्त फल है।
होती गुरु गोविन्द कृपा, क्या जीवन उसका निष्फल है।।

जिसको पकड़ें, वह धन्य धन्य हो जाय सदा मन वचन काय।
गुन करम काल अवगुन छूटें परसे कैसे पापी अपाय।।

मन बुद्धि अहंकृत चित्त शुद्धि होकर प्रबुद्ध बोधित यह जन।
पृथ्वी जल आकाश वायु वैश्वानर स्थूल शुद्ध कन कन।।

पावन गुरुपादपद्म पाकर होगा कैसे कोई अशुद्ध।
अब स्थूल सूक्ष्म भागवत् प्रकृति सद्य: जाता परि शुद्ध बुद्ध।।

चाहे जैसे “दास” कामना, पड़ती रह पदनख प्रकास।
यह दीन अनन्य भाव भावित अब कहां अन्य अभिलाष आस।।

हर हर अकाश दीखे प्रकाश श्रीविन्ध्यजननि मात: स्वरूप।
क्या देखि रूप विन्ध्येश्वरीदास शोभा अनन्त विस्तृत अनूप।।

पाकर विन्ध्याचल जनम जात यह कृपा हुई अविगत अविचल।
कहती गंगा की विमल धार अविकल करती कल कल कल कल।।

श्री गुरु शास्त्र निष्ठ नाना विध विधि हरि हर हारित अविकल।
सबै भगत यहि कृपा करौ गुरुपदहिं रमै मन विकल विकल।।

हरिगुरुसन्त: शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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