श्रीराम तारक मन्त्र प्राप्ति क्रम

त्रिपाद् विभूति नित्य साकेत में भगवती जानकी की सेवा से प्रसन्न होकर भगवान् श्रीराम ने षडक्षर श्रीरामतारक मन्त्र माता जी को प्रदान किया था।
श्रीअग्रदेवाचार्य ने इसका उल्लेख किया-

परव्योम्नि स्थितो रामः,पुण्डरीकायतेक्षणः
सेवया परया जुष्टं जानक्यै तारकं ददौ।।

1-अतः श्रीरामतारक की प्रथमाचार्या
श्रीजानकी जी हैं। यही श्रीजी हैं, और हमारा वैष्णव सम्प्रदाय श्रीवैष्णव सम्प्रदाय है।
2-इसके बाद जगदम्बा जानकी जी ने यह मन्त्र श्रीहनुमानजी महाराज को दिया था इसलिए द्वितीय आचार्य हनुमानजी हैं।
3-हनुमानजी ने यह मन्त्र कृपापूर्वक ब्रह्मा जी को दिया,और ब्रह्मा जी तृतीय आचार्य हुए।
4-श्रीब्रह्माजी ने यह मन्त्र श्रीवशिष्ठजी को प्रदान किया।अतः चतुर्थ आचार्य महर्षि वशिष्ठ जी हैं।
5- श्रीवशिष्ठजी ने यह रामतारक अपने पौत्र महर्षि पराशर को प्रदान किया, जिससे महर्षि पराशर पंचम आचार्य हुए।
6-महर्षि पराशर ने उक्त मन्त्र अपने पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजी को दे दिया, और व्यास जी षष्ठ आचार्य रूप में परिगणित हुए।
7- व्यासदेव ने यही रामतारक मन्त्र अपने पुत्र श्रीशुकदेवजी को प्रदान कर दिया,यह महामुनीन्द्र अमलात्मा विमलात्मा परमहंस चक्रचूडामणि श्रीशुकदेवजी मन्त्र के सप्तम आचार्य हैं।
8-श्रीशुक भगवान् ने यही मन्त्र महर्षि बोधायनाचार्य को दिया, जिनका एक नाम पुरुषोत्तमाचार्य भी है।इसलिये महर्षि बोधायन, षडक्षर श्रीरामतारक के अष्टम आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्ही महर्षि बोधायन ने ब्रह्मसूत्र पर विशिष्टाद्वैत परक बोधायनवृत्ति लिखी।
9-इन्ही बोधायनाचार्य से चलकर यह श्रीरामतारक “षडक्षर” श्रीराघवानन्दाचार्य
को प्राप्त हुआ।और ज्ञातव्य तथ्य है कि एक अंश से साक्षात् वशिष्ठजी ही राघवानन्दाचार्य के रूप में प्रकट हुए थे।
10-यही मूल मन्त्र राघवानन्दाचार्य जी से यतिराज श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् को प्राप्त हुआ।वैष्णव जगत् की मान्यता है कि ये रामानन्दाचार्य भगवान् तो स्वयं श्रीरामजी ही प्रकटे हैं।
आगे चलती हुई यह “श्रीरामतारक” मन्त्र की परम्परा अनन्त विस्तरण के कारण आज भी अनेकानेक पूजनीय गुरुओं के माध्यम से जीवों का उद्धार कर रही है।

ध्यातव्य है कि भगवान् के नित्य साकेत में श्रीरामजी द्वारा श्रीजी जानकी जी को प्रदत्त यह “श्रीरामतारक” षडक्षर मन्त्र पारम्परिक रूप से आदि रामानन्दाचार्य भगवान् को प्राप्त होता है।

प्रचलित तथ्य है कि यह आदि श्रीरामानन्दाचार्य भगवान् श्रीभरतभाव काअतिशय प्रेमरसास्वाद करने हेतु स्वयं श्रीरामजी ही प्रकट हुए थे। आपने प्रयागक्षेत्र में माता श्रीमतीसुशीला और श्रीपुण्यसदन वाजपेयी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया। और लगभग दो सौ साठ वर्ष तक धरती पर विराज कर सभी प्रणत जनों को रामतारक मन्त्रराज देकर तार दिया।

रामानन्दः स्वयं रामः प्रादुर्भूतो महीतले।।

यही रामानन्दीय श्रीवैष्णवों की अति श्रेष्ठ सुदीर्घा परम्परा है। यहाँ कोई सम्प्रदाय भेद नहीं है।सभी जाति वर्ग के प्रणत जनों के परम कल्याण हेतु सभी को यह षडक्षर श्रीरामतारक प्राप्त हुआ।
श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् का महत्तर उद्घोष था कि सभी जीव भगवत् शरणागति के अधिकारी हैं-
“सर्वे प्रपत्तेरधिकारिणः सदा”

हरि:शरणम्
https://shishirchandrablog.in

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment