उमंगहि भरे मोद मनि 

दक्षिण में लक्ष्मण बसत वाम भाग सिय साथ।सम्मुख हनुमत बैठि जहँ मध्य रहें रघुनाथ।।
लिये अजन्मा जनम शुभ चैत्र शुक्ल मधु मास।नवमी तिथि मध्याह्न पल सुन्दर अवध अकास।।

राक्षस अति आचार सुनि जनम लीन्हि  रघुश्रेष्ठ।दुष्ट दलन कर काज हरि सन्त जनन के प्रेष्ठ।।

मर्यादा स्थापित करी भे मर्यादाग्रज प्रभु। मर्यादा उत्तम पुरुष तबहिं प्रसिद्ध विभु।।

राम नाम उच्चरत जे चतुर सुजान कहात।भूरि नाम के दान करि दानी परमसुहात।।

चैत्री तिथि नवमी सुखद शुक्ल पक्ष प्रति काल।गावत सुमिरत राम कहु गये अकाल दुकाल।।

विन्ध्येश्वरि को दास येहिं श्रीगुरुकृपा प्रभाव।नाम राम को सुमरि कहि अति आनन्दहिं पाव।।

अति आनन्दहिं पाइ राम को नाम मोद मय।धन्य धन्य मुख गात हरष महिं डूबत जय जय।।

जय जय श्रीभगवान् हरी नारायण नरजनि। नारद शुक सनकादि उमंगहि भरे मोद मनि।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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