भक्तशिरोमणि हनुमान

अति सनेह का उमड़ा सागर।
भाव दशा में रघुवर नागर।।

सेवा धारि सेव्य की मनहीं।
बानर जन्म लिये शिव तबहीं।।

हनु सविशेष जानि माता ने।
हनूमान नामा तनु ताने।।

राम काज लीन्हे अवतार।
सीता खोजि आय एहिं पार।।


रामकमल-पद भये भ्रमर।
सीताशीष बने अजरामर।।


भगत शिरोमणि हे हनुमान।
राम-भक्ति दो रहें अमान।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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