जेहिं पर कृपा करहिं जनु जानी,कवि उर अजिर नचावहिं बानी।।
जानै वही जान जानो,कृपा केवल हरी और हरी के दासन की मानो।।
नातो नारायण सों जो मनै वहै मानो,करते स्वीकार वह सच्चे से हृदय जानो।।
हरि हरिदास हरैं प्रेमियों के चित्त सदा,होवै समरपन से हरषन प्रवर्ष मुदा।।
ऐसे दास दासन के प्रणते सन्तोष मिले, मिटै काम,पूर्ण होवै चाहै कुछ भी न ले।।
निकसै तबै बानी भूलिजगद्व्यवहार हार, मान लो तब नष्ट हुआ सदातना कर्म जार।।।
सन्तों ने कही सही बालमीकि भये मान,तुलसिदास नाम सिद्ध काटैं कलि के वितान।।
गुरू पाय “नरहरि” सुनी कथा राम की सुजान, गाई तबै रामकथा रामायन महि महान।।
कठिन कलि काल जबै सबै बेहाल भये,राम के चरित्र छन्द बद्ध द्वादश काव्य नये।।
काल के कुचाल कुचले हैं सदा तुलसि- बानि,जीवजन्मजगतबन्ध तोरि फेंके तानि तानि।।
अशरण को शरण सदा “तुलसी” रामायन भयो ,राम भक्ति भक्तश्रद्धा कलुषित कलजुग्ग गयो।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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