जेहिं पर कृपा करहिं जनु जानी,कवि उर अजिर नचावहिं बानी।।
जानै वही जान जानो,कृपा केवल हरी और हरी के दासन की मानो।।
नातो नारायण सों जो मनै वहै मानो,करते स्वीकार वह सच्चे से हृदय जानो।।
हरि हरिदास हरैं प्रेमियों के चित्त सदा,होवै समरपन से हरषन प्रवर्ष मुदा।।
ऐसे दास दासन के प्रणते सन्तोष मिले, मिटै काम,पूर्ण होवै चाहै कुछ भी न ले।।
निकसै तबै बानी भूलिजगद्व्यवहार हार, मान लो तब नष्ट हुआ सदातना कर्म जार।।।
सन्तों ने कही सही बालमीकि भये मान,तुलसिदास नाम सिद्ध काटैं कलि के वितान।।
गुरू पाय “नरहरि” सुनी कथा राम की सुजान, गाई तबै रामकथा रामायन महि महान।।
कठिन कलि काल जबै सबै बेहाल भये,राम के चरित्र छन्द बद्ध द्वादश काव्य नये।।
काल के कुचाल कुचले हैं सदा तुलसि- बानि,जीवजन्मजगतबन्ध तोरि फेंके तानि तानि।।
अशरण को शरण सदा “तुलसी” रामायन भयो ,राम भक्ति भक्तश्रद्धा कलुषित कलजुग्ग गयो।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Month: February 2025
चण्ड और मुण्ड दोनों प्रवृत्ति मार्गी हैं
चण्ड और मुण्ड दोनों प्रवृत्ति मार्गी हैं। तमोगुणी हैं। संसार ही चाहिए दोनों को।
संसार में चित्त वृत्ति अथवा प्रवृत्ति अथवा संसार लोभ अथवा अविद्या अथवा माया सभी एक ही बातें हैं।हमी चण्डमुण्ड हैं।नाना जन्म बीते शरीर बदला हम नहीं बदले,हमें संसार चाहिए।और चाहिए तो हम रावण कंस चण्डमुण्ड शुम्भनिशुम्भ महिषासुर नहीं तो और क्या हैं?
मोक्ष का मतलब है सब कुछ त्यागना या छोड़ना।
भक्त को जब भगवान्/भगवती से और कुछ नहीं चाहिए।चाहिए केवल और केवल एकमात्र वे भगवान् और भगवती ही,तब जाकर मानो कि मोक्ष हुआ।ध्यान से समझ लीजिए नारायण!
रूपया पैसा मान बड़ाई पद पदार्थ प्रतिष्ठा ही मुझे चाहिए अगर तो हम – रूपयादास,पैसादास,मानदास,बड़ाईदास,पददास, पदार्थदास,प्रतिष्ठादास ही तो हैं। इसीलिये संसार और संसार की चीजें पाने की ललक हमें बार बार आवागमन जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझाये हुए हैं।
नारायण! जब हम हार मान लेते हैं, और संसार की हर वस्तु से दुःख का अनुभव शुरु होता है, तब इनसे निवृत्ति पाने या छूटने के लिए तड़प होने लगती है तब अकारण करुणामयी माँ अपना वात्सल्य उड़ेलने के लिए कोई सन्त/सद्गुरु से मिलाती है।
सन्त सद्गुरु और कोई नहीं वह कृपामयी करुणामयी माँ ही हैं।संसार से लड़ते लड़ते हथियार डालने पर,और शरणागत होने पर,या यों कहें सरेण्डर कर देने पर सन्त सद्गुरु निवृत्ति(मोक्ष) देकर तार देते हैं।
उतार देते हैं, ऐसी धरती पर जहाँ हम संसार पाने की भीख नहीं चाहते।
अतः प्रवृत्ति चण्डमुण्ड है।
चामुण्डा वह सन्त सद्गुरु हैं इन्ही से निवृत्ति(छुटकारा) वाला मार्ग मिलता है।
श्रीमद्भागवत शास्त्र में स्वयं श्रीभगवान् ने – आचार्यं मां व्यजानीयात् नावमन्येत कर्हिचित्।न मर्त्यबुध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः।
मतलब कि आचार्य सन्त सद्गुरु ही भगवान्/भगवती के रूप हैं। समस्त देवी देवता ये सन्त सद्गुरु हैं।
तब इस चमड़े के शरीर धरे ये सन्त सद्गुरु हमें तारने और जन्मो के संसार नशे को उतारने के लिए बैठे हैं।
आवश्यकता है, सरेण्डर शरणागत होने की।
शरणागति वह सार है देती नशा उतार। गुरु शरणागति के बिना कोउ ना उतरा पार।।
हरिः गुरुसन्तः शरणम्
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