नाम कहे नामी बोले

अपने गुरु भगवान् देहातीत अवस्था के स्वामी हैं। सभी सन्तों और शास्त्रों सहित अपने प्रभु भी नाम को ही सविशेष अशेष पाप का विनाशक नाम को ही माने हैं।
सन्त भगवत् भागवत गुरु मत यही कि जब साधक नाम अथवा कोई मन्त्र विशेष जपे तब उस मन्त्र के अक्षर पर सतत ध्यान रहे।
समय जरूर लगता है, ऐसे जप में।
लेकिन इसी नाम जप से नामी का स्वरूप दृष्ट होता है-“नाम कहे नामी बोले”
दृष्टस्वरूप से स्वस्वरूप मिल जाता है।
यही बात नाम लेखन के अक्षर से भी है।क्षरण/ नाश नहीं होने वाला अवस्थान ही स्वस्वरूपाधिष्ठान है।
इसीलिये मानव शरीर है, स्त्री पुरुष जाति इस प्रस्थान में बाधक नहीं। मीरा रैदास तुलसी तो परम प्रमाण ही हैं।
अविद्या माया जगद्भ्रम के नाश तथा विद्या अमाया और जगत् स्थैर्य का परम परम साधन एकमात्र नाम है।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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