काहू सौं कछु न चहौंगो,अविगत गतिहि लहौंगो।
गुरुकृपया गहि छाप तिलक मन्त्रहिं मन मनन करौंगो।
अहंकार अति विषम वारि लहि गुरुपदकमल तरौंगो।
देइ कोउ कछु कहै भलो,एहिं तृष्णा उर न धरौंगो।
दास विचारत सब सन हारत भगतहि आस करौंगो।
श्रीगुरुपद रज भव भय भंजन माथे धरै फिरौंगो।
भक्ति भगत भागवत गुरू करुणहि श्रीपतिहिं लहौंगो।
और न बूझत कोउ मारग पचि पचि अब नाहिं मरौंगो।
हरि-गुरु-सन्त-पाद-पदमन लहि जीवन सफल करौंगो।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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