जीवन सफल करौंगो

काहू सौं कछु न चहौंगो,अविगत गतिहि लहौंगो।

गुरुकृपया गहि छाप तिलक मन्त्रहिं मन मनन करौंगो।

अहंकार अति विषम वारि लहि गुरुपदकमल तरौंगो।

देइ कोउ कछु कहै भलो,एहिं तृष्णा उर न धरौंगो।

दास विचारत सब सन हारत भगतहि आस करौंगो।

श्रीगुरुपद रज भव भय भंजन माथे धरै फिरौंगो।

भक्ति भगत भागवत गुरू करुणहि श्रीपतिहिं लहौंगो।

और न बूझत कोउ मारग पचि पचि अब नाहिं मरौंगो।

हरि-गुरु-सन्त-पाद-पदमन लहि जीवन सफल करौंगो।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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