हरिनाम से सारे पाप कटते हैं, लेकिन यह पाँच पाप नहीं कटते। चन्द्रकला सखी के अवतार श्रीअग्रदेवाचार्य के पद में यह बात आई है। अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर अपने महाराज जी ने गोपाष्टमी के दिन सूरश्याम गोशाला के अष्टादशवें महोत्सव में श्रीभद्भागवत श्लोकक्रमचर्चा में दि.09/11/2024को उक्त प्रकरण का उल्लेख किया।
गुरु भगवान् ने पद नहीं कहा था,केवल व्याख्यानम मात्र किया था।”दास”ने जैसा सुना था,उसे “उन्ही”की कृपा ने काव्य का आकार दे दिया-
गुरू विषय नर बुद्धि, भक्त की जाती जाने।
शिलासमान गनै हरिमूरति चरणोदक जल माने।।
महाप्रसादहि अन्न मानि सो बनै पाप दुर्घट आकार।
कटत नहीं हरि नाम जपै यह नहिं इसको कोऊ निस्तार।।
हे गुरु भगवन् भक्त भक्ति करुणा करु।
एहिं प्रपंच ये पापपंच आवै ना हिय तरु।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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