कस्मादरविन्दमुखाद् अवतीर्णेयं सरस्वती।
पहुनामिथिलापूर्णावासः चोरयते चित्तम्।।
ए पहुना मिथिलै में रहुना।।
पहुना देखो एक रूप से मिथिलै में रहि गयना।
भयौ विवाह जनकतनया तैं ससुरारी कै भयना।।
ससुरारी में रामचन्द्र पहिरत शादी कै गहना।
सिया मिलन से भै अधीर सब धैर्य धार बहि गयना।।
बानी बनी मूक सब समझत कहि न जाइ कछु कयना।
देखत निरखत जनक दुलारी मूँदि गये द्वौ नयना।।
रास रसेश्वरि रसलीला लखि कोटि वारुँ रतिमयना।
शोभा कैसी मनहर देखो सियाराम कै हियना।।
चित्त चुराये भै हरषाये सियाराम कै बयना।
अवध जनक पुर वासी जड़वत् कछू न चाहैं लयना।।
सीताराम मिले दोनो मिलि गणित फेल ह्वै गयना।
एक एक दो एक बने यह गणितहुँ समुझि परयना।।
यह विवाह लीला अनन्त की दिव्य देखु द्वै नयना।
दास विन्ध्येश्वरि मोद भरे नाचत कहि जय जय जयना।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
http://shishirchandrablog.in