जीवन सफल करौंगो

काहू सौं कछु न चहौंगो,अविगत गतिहि लहौंगो।

गुरुकृपया गहि छाप तिलक मन्त्रहिं मन मनन करौंगो।

अहंकार अति विषम वारि लहि गुरुपदकमल तरौंगो।

देइ कोउ कछु कहै भलो,एहिं तृष्णा उर न धरौंगो।

दास विचारत सब सन हारत भगतहि आस करौंगो।

श्रीगुरुपद रज भव भय भंजन माथे धरै फिरौंगो।

भक्ति भगत भागवत गुरू करुणहि श्रीपतिहिं लहौंगो।

और न बूझत कोउ मारग पचि पचि अब नाहिं मरौंगो।

हरि-गुरु-सन्त-पाद-पदमन लहि जीवन सफल करौंगो।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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सद्भिः शास्त्रैश्च प्राप्यते

शरीरं मृद्भाण्डं तद् यदा रामो न धार्यते।
रामे मनस् तदा जातं चिन् मयं तत्कलेवरम्।।

कस्तूरिका नाभिदेशे राजते गन्धमादिनी।
मृगेणान्विष्यते सैव बहिर्वनवनान्तरे।।

एवम् अनन्तं च सत्यं च ज्ञानसत्वं ध्रुवं  स्थितम्।सच्चिदानन्दात्मके ह्यात्मनि गुरुकृपयानुभूयते।।

कोहं कस्मादहं जातः कुत्र लक्ष्यं न पश्यति।शास्त्रस्य कृपया लक्ष्येत् स्वात्मदृष्टिः न संशयः।।

आत्मा कः परमात्मा कः तस्यैकत्वं न पश्यति।सतां हि कृपया लक्ष्येत् स्वात्मदृष्टिः न संशयः।।

विहितानां हि कृत्यानां धारणं  नैव वारणम्। निषिद्धकर्मणां त्यागः विवेकत्वात् परा गतिः।।

मनुष्याणामात्मकल्याणं स्वात्मनैवावधार्यते।
अतः सन्तः सदा धार्याः मनोवाक्कायकर्मभिः।

सतां यत् सङ्गस्तत् पुण्यैः कृत्यैः फलीयते।
हरेर्गुरोः कृपातो वा रसस्याधिगमो भवेत्।।

अतः सतां च शास्त्राणां प्रीतिः प्रति प्रतीयते।सदात्मकल्याणप्राप्तिः सद्भिः शास्त्रैश्च प्राप्यते।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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पापपंच

हरिनाम से सारे पाप कटते हैं, लेकिन यह पाँच पाप नहीं कटते। चन्द्रकला सखी के अवतार श्रीअग्रदेवाचार्य के पद में यह बात आई है। अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर अपने महाराज जी ने गोपाष्टमी के दिन सूरश्याम गोशाला के अष्टादशवें महोत्सव में श्रीभद्भागवत श्लोकक्रमचर्चा में दि.09/11/2024को उक्त प्रकरण का उल्लेख किया।
गुरु भगवान् ने पद नहीं कहा था,केवल व्याख्यानम मात्र किया था।”दास”ने जैसा सुना था,उसे “उन्ही”की कृपा ने काव्य का आकार दे दिया-

गुरू विषय नर बुद्धि, भक्त की जाती जाने।
शिलासमान गनै हरिमूरति चरणोदक जल माने।।

महाप्रसादहि अन्न मानि सो बनै पाप दुर्घट आकार।
कटत नहीं हरि नाम जपै यह नहिं इसको कोऊ निस्तार।।

हे गुरु भगवन् भक्त भक्ति करुणा करु।
एहिं प्रपंच ये पापपंच आवै ना हिय तरु।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जय जय जयना

कस्मादरविन्दमुखाद् अवतीर्णेयं सरस्वती।
पहुनामिथिलापूर्णावासः चोरयते चित्तम्।।

ए पहुना मिथिलै में रहुना।।

पहुना देखो एक रूप से मिथिलै में रहि गयना।
भयौ विवाह जनकतनया तैं ससुरारी कै भयना।।


ससुरारी में रामचन्द्र पहिरत शादी कै गहना।
सिया मिलन से भै अधीर सब धैर्य धार बहि गयना।।

बानी बनी मूक सब समझत कहि न जाइ कछु कयना।
देखत निरखत जनक दुलारी मूँदि गये द्वौ नयना।।

रास रसेश्वरि रसलीला लखि कोटि वारुँ रतिमयना।
शोभा कैसी मनहर देखो सियाराम कै हियना।।


चित्त चुराये भै हरषाये सियाराम कै बयना।
अवध जनक पुर वासी जड़वत् कछू न चाहैं लयना।।


सीताराम मिले दोनो मिलि गणित फेल ह्वै गयना।
एक एक दो एक बने यह गणितहुँ समुझि परयना।।


यह विवाह लीला अनन्त की दिव्य देखु द्वै नयना।
दास विन्ध्येश्वरि मोद भरे नाचत कहि जय जय जयना।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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