आत्मप्रकाश


सौभाग्यम् दर्शनीयं किम् अस्याः देव्याः विचार्यताम्।

अस्मद्गुरुजननीयं देहत्यागे विशिष्यते।

नाम्ना व्रजलता सिद्धा रजव्रजे महीयते।।

त्यक्त्वा स्वं पार्थिवं देहं  श्रीमलूकगुरुसन्निधौ।

सिद्धां कोटिं विधास्यन्ती सा गता किम् नु स्वागता।।


एकाशीतिवैक्रमे वर्षे द्विसहस्रसितमाधवमासि पाञ्चभौतिकं त्यक्तं गात्रं द्वादश्यां तिथिरायाते।।

वृन्दाशालग्रामविवाहे सम्पन्ने वृन्दाविपिने।

श्रीधामनि व्रजलता रोपिता व्रजे माधवीसुधायुता।।

क्या देखिये विलसती शोभा देवी देहत्याग करे।

विन्ध्येश्वरि दासहिं  गुरुमाता गई पार्थिवहिं देह परे।।

नाम व्रजलता नित व्रजवासिनि किया दिव्यवैकुण्ठ प्रयाण।

श्रीमलूक पीठहिं त्यागा तन किया प्रसिद्ध स्थान प्रमाण।।

रही वृत्ति आजीवन इनकी नामरूपलीलागुण धाम।

यही कार्य कारण लगता है हुआ धन्य जीवन निष्काम।।

व्रज की लता आय उपजी थी निकट ओरछा राजाराम।

धन्य धन्य धन्यातिधन्य है देखो यह “आचार्य” ग्राम।।

निज स्वरूप भावानुरूप पति पाणिगृहीता “रामस्वरूप”।

मन निरमल अध्यापनजीवन चितप्रविष्ट”श्रीरामस्वरुप”।।

रहा पूर्ण पातिव्रत जीवन वृत्ति लगी पद-सीताराम।

पाण्डे कुल भी धन्य धन्य व्रजलता पता पा मुदित लगा।

ग्राम-निवासी रामकथासी  भक्ति ज्ञान वैराग्य जगा।।

रामकृष्णहरिनारायण पदकमल विमल व्रजलता-कार।

“राजेन्द्रदास” सुत सुन्दर जन, जन-जन का किया दिव्य उपकार।।


ऐसी माता कै चरणन चित ध्यान,धन्य  विन्ध्येश्वरि-दास।

भाग बड़े अनुभवत मोद भरि लेत आत्माराम प्रकाश।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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