श्रीधामवृन्दावन शोभित स्वयं प्रकट प्रतिमा भई।रूपगोसाईंपाद पाय गोविन्ददेव राधा नई।
म्लेच्छ तमस तामिस्र बूझि छाँड़ो वृन्दावन।
मानसिंह कै महल महित जयपुर महि आवन।
जय जय राधे गोविन्द गावत लसत छत्र क्षत्री धरा।
भगत परीपूरन मना जा दरसे नहिं आव धरा।
जा कर करि दरसन सुखद परम शान्ति कौ मूल।
पुण्य पाप नहिं रहे जाय आमूल चूल।
होय अनन्द अनन्त पाय गोविंद राधे पद।
फीको परै जाय मोच्छ मुद पावै ऐसौ आनद।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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