अद्भुत आनन्द


कैसी कमनीय रहनि कै सहनि
दर्शनीय दीखै चलनि बोलनि।    
रसमग्न होति भगवदीयकरनि
जया एकादशि तिथि निरखि।

देहपार्थिवतः निश्वासनिःसरनि
श्रीरामकृष्णलीला प्रविशनि।
विक्रम संवत् दोहजार गवनि 
इक्यासी चलनि शुक्रवासरनि।

भाद्रकृष्णा वैष्णव एकादशिनि
तिथि नित्यलीला-ललाम-लीनि।
रैवासाधाम अग्रपीठाधीश्वरनि
नामतः प्रसिद्ध श्रीराघवाचार्यनि।

नमत्यनेकधा जनः तच्चरणनि
पिण्ड त्यागि ब्रह्माण्डसंचरनि। 
दिव्य-देव-लोक-धाम-धामनि
अति-विराट-राज्यश्री-प्रसरनि।

अग्रपीठ श्रीमहान्तपदरिक्त भवनि
तदीयपदधारण हित निरधरनि।
श्री-मलूक-पीठ अधि ईश्वरनि
परमोदार-साधु-शिरोमणनि।

“दास विन्ध्येश्वरी”नत मन मननि
लखि लीला सिद्धसाधुभूषणनि।
सानँद लखत सबै सभ्यसन्तनि
राघव-राजेन्द्र-रमणीय-करनि।

विद्यमान अग्रपीठ अस्मद् गुरुनि
साधु-सदाचार-मूर्त-विग्रहनि।
मोदमान “दास” दिव्य दर्शननि
अद्भुत आनन्द रसमग्न रसनि।

हरिः शरणम्
http://shishirchandrablog.in

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment