पुण्यपुराकृत कर्म भोगवश इन्द्र पदवी किन्ही निष्कामी प्रेमी भक्तों के लिए हेय और तुच्छ है।”इन्द्र” इन्द्रियभोगी देशकाल बाधित व्यक्तित्व है।
जबकि गोपीजन अबाधित आनन्द सत्ता में विहार करने वाली तात्विक प्रेमाभक्ति होने से देशकालातीत तत्व।”सदृश श्वान मघवान युवानू” (सन्तप्रवर तुलसीदास)
अर्थात्-
इन्द्र-युवक और कुत्ता समान भोगभोगी लोलुप इन्द्रियोन्मुखी तत्व होने से विमुख जीव कोटि में हैं।जबकि गोपियाँ सन्मुख जीव।गोपियाँ वेद की ऋचाएं हैं, इसलिए की भगवान् ऐसे ही निष्कामी प्रेमियों के साथ मानव रूप धर कर श्वास-प्रश्वास पूर्वक क्रीडारत होते हैं।
और ऋचाएं गोपिकाएँ इसलिये भी हैं कि, तस्य निःश्वसिताः वेदाः है। भगवान् की निर्गत श्वास वायु सृष्टिरचना हेतु निर्दिष्ट ब्रह्मा जी के कानों में पड़कर मुखनिःसृत होकर वेद मन्त्र हो गई हैं। यह गोपिकाएं भगवान् के लिए भगवान् को चाहती हैं।
अनन्याः चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते के स्वरूप में यह गोपिकाएं भगवान् की अनन्य प्रेमी भक्ता हैं।यह भगवान् की चरम परम प्रेम का जीवन्त रूप हैं। ऋचा और गोपी दोनों स्त्री हैं।और पुरुष तो एकमात्र पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही हैं। भक्तों के साथ लीला ललाम लीनता भगवान् की ही होती है,किसी भोगी विषयी पामर जीव के साथ नहीं। इन्द्र भोग का प्रतीक है तो गोपीजन परमचरम प्रेमयोग की।
श्वासरूप हैं गोपियाँ भगवान् की। इसलिये कि भक्त और भगवान् का सम्बन्ध अभिन्न है। भगवान् का अप्राकृत दिव्य देह विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन मनुज अवतार होने के साथ भक्तों के साथ क्रीडा प्रयोजन अपेक्षित प्रेक्षित है।
इसलिए वानर भालु ऋषि और ऋचाओं का गोप-गोपी रूप धर कर नित्य के साथ नित्य की लीला है।
क्योंकि नित्य, अनित्य के विजातीय होने से कैसे खेल सकता है।
इसलिये सृष्टि के आरम्भ में उपजी, नित्य ऋचाओं का गोपी भाव आश्चर्य जनक नहीं है। “गो” शब्द इन्द्रिय वाचक है।”प” शब्द पालन रक्षण के लिए प्रयोग होता है।इसलिए, इन्द्रिय रुप गो का पालन रक्षण इन्ही भगवान् द्वारा होना स्वाभाविक है।
सम्पूर्ण भागवतविमर्श का सारत्व भगवान् के लीलावतार द्वारा मानव शिक्षा का प्रायोगिक निदर्शन है।भक्त-भगवान् की लीला का अद्भुत स्वरूप भागवत में दीखता है, क्योंकि अन्ततः चाहे मरण धर्मा ब्रह्मा हों या तद्वत् रूप विनाशी इन्द्र ,सभी एक अद्वितीय भगवान् की ही स्तुति करते हैं।इन्द वैदिक देवता होने पर भी प्रचण्ड मायावी दुर्धर्ष रावण की सभा में “इन्द्रं माल्यकरम्” (हनुमन्नाटक)
माली का काम करते दीखते हैं।भगवान् अंगी हैं और इन्द्र अंगरूप हैं। इसलिए अंगीरूप श्रीकृष्ण भगवान् की पूजा होनी चाहिये, अंगरूप इन्द्र की नहीं,इसी अव्यवस्था को मेटने हटाने की लीला है इन्द्रपूजा के स्थान पर गोवर्धनपूजा की परम्परा की अवतारणा। ऐसी पौराणिक घटना को सज्जन प्रेमी वृन्दजनों को वेद और लोक के सामंजस्यरूप में अवश्य देखना चाहिए किसी विरोध में नहीं।
किसी लोकादि कीर्ति की वासना कामना से प्रेरित होकर काम करने पर तो एक मानवजीवन और व्यर्थ हो जायेगा।
वेद की विद्वान् वाली अवधारणा जो अभेद तत्वदर्शनवती है, उसी को विद्वान् की परिधि में रखना चाहिए,न कि कीर्तिकामी प्रचारपरायण व्यक्ति के लिए।वेद कहते हैं-“विद्वान् न विभेति कदाचन”
संसार प्रवाह और कामना वासना तो संसार में बार बार उलझायेगी।इसलिए भगवान् आदि शङ्कर के अनुकूल सन्तवेदशास्त्र सिद्धान्त आचरण ही निष्कामी सद्गुरु पादाश्रय देगा, जिससे पुराणों और व्यासवाणी का यथार्थ जानकर मानव जीवन सफल हो सकता है अन्यथा भगवान् के साथ अनन्यता की अबोधदशा में “माया” चढ़ बैठेगी,यथार्थ ज्ञान नहीं होगा और ऐसे ही पौराणिक वर्णनों में विरोध अवरोध की दृष्टि बनी रहेगी। इसलिये विनय और प्रेम का आश्रय लेकर रामहिं भजहिं ते चतुर नर
का अनुप्रयोग सारी जड़ता से मुक्ति का एकमेव उपाय है।इन्द्रपूजा को परम्परा सुधार की प्रेमदृष्टि से देखना चाहिए, न कि वेद शास्त्र लोक विरोध दृष्टि से।
हरिः शरणम्।
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