श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रम्

बालं नवीनशतपत्रविशालनेत्रं बिम्बाधरं सजलमेघरुचिं मनोज्ञं
मन्दस्मितं मधुरसुन्दरमन्दयानं श्रीनन्दनन्दनमहं मनसा नमामि ॥१॥

मञ्जीरनूपुररणन्नवरत्नकाञ्ची-श्रीहार केसरिनखप्रतियन्त्र-संघम्।
दृष्ट्यार्तिहारिमषिबिन्दुविराजमानं, वन्दे कलिन्दतनुजा-तटबाल-केलिम् ॥२॥

पुर्णेन्दुसुन्दरमुखोपरि-कुञ्चिताग्रा: केशा: नवीनघननीलनिभा: स्फुरन्ति।
राजन्त आनतशिर:कुमुदस्य यस्य नन्दात्मजाय सबलाय नमो नमस्ते ॥३॥

श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रं प्रातरुत्थाय य: पठेत् ।
तस्य नेत्रगोचरं याति सानन्दं नन्दनन्दन:॥४॥

उपवास का विशुद्धार्थ

नारायण महात्माओं की दृष्टि तो साधु गुरुशास्त्रसम्मत होती है।अतः इस दृष्टिकोण से उपवास का अर्थ ‘दास’की विचारसरणि में त्रिविध है।वह है, सिद्धार्थ मूलार्थ और गूढार्थ। सिद्धार्थ शास्त्र सम्मत कहनी है। उप अर्थात् समीप में वास माने बसना,इसमें विप्रतिपत्ति नहीं है।यही है सिद्धार्थ।यह समीपता,इस बात की स्वयं अनुभूति है, कि हम प्रतिक्षण अपने अंशी(परमात्मा)के समीप ही बस रहे हैं।

अब जगत जिस अर्थ को ग्रहण करता है, वह है अल्प मात्रा में सात्विक फलमूलादि लेकर भगवत् चिन्तन पूर्वक नारायण की “उनकी”समीपता का अनुभव करना।यही वस्तुतःमूलार्थ है, जो स्पष्ट ही है। अल्पाहारपूर्वक देशकाल की मर्यादा में रहना और भगवच्चिन्तन करना ही प्रमुख मूल अर्थ है।

अब गूढार्थ विचारें तो यह है? जीवात्मापरमात्मयोग। यह भी “कृपालु” महात्मा बताते रहते हैं। यह सिद्धार्थ मूलार्थ और गूढार्थ परस्पर अभिन्न ही समझना चाहिए।
अब उपवास के “तुरीय”और अपर चतुर्थ अर्थ पर भी एक विचार कर लिया जाय। हालाँकि यह चौथा अर्थ भी पूर्वोक्त त्रिविध अर्थों से अभिन्न ही है। यह सूक्ष्मार्थ है।

यह क्या है, वह यह है कि, यह जीवपरमात्मा का सम्बन्ध परस्पर अपृथक् है,ऐसी दृष्टि शनैः शनैः विकसित हो जाय,माने कि अभेद दृष्टिकोण बने। इसीलिये नारायण! मायाकृत प्रारब्ध भोगी मनुष्य के पीछे नारायण ने अपनी “माया” लगा दी है दौड़ा दी है।
ताकि वह ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः मेरा सनातन सदातन अंशभूत जीव परेशान थक हार कर जन्मजन्मान्तर से ऊब कर मुझे देखे और कहे,अनुभव करे कि हे राम! तवास्मि
इसीलिये सनातन ऋषियों ने “उपवास” का विधान रचा है।
यह है,उपवास का सूक्ष्मार्थ।
नारायण! यह योगमाया या माया संसार वर्धन के लिये अथवा कहिये, सृजन पालन और संहार के लिये है। माया ही संसार रचती पालती है। निग्रह का कार्य वस्तुतः भगवान् का है। संसार ऐसे ही चलता रहता है। लेकिन जब हमारे स्वामी(भक्तसन्तगुरु) चाहैं,तब माया अविद्या भ्रम और इसके रचित आवरण विक्षेप सभी कुछ,क्षण मात्र में नष्टभ्रष्ट हो जायें। नहीं तो कठिन है डगर पनघट की।

गोस्वामी जी ने संसार की समस्त नारी मात्र को “नारि विष्णु या विश्व माया प्रकट” कहकर इनसे अति सावधान रहने का संकेत किया है।गृहस्थाश्रमी को स्वस्त्री छोड़कर नारीमात्र के लिये, मातृदृष्टि का आदेश है। यह भी उपवास का सूक्ष्मार्थ ही है।
वस्तुतः इसलिये सारतः तत्वज्ञान के लिये, जीवपरमात्माभेद के लिए, और माया अविद्या की निवृत्ति के लिये ” उपवास ” शब्द प्रयोज्यमाण है।
नारायण! यही उपवास का विस्तृत समग्रार्थ है।यह उपवास शब्द संकेत है, आहार शुद्धि का भी,क्यों?
क्योंकि शास्त्रवचन ही प्रमाण है- “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः,सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
आहार शुद्धि के बिना, अविद्या माया संसार की स्मृति रहने से बारम्बार संसार आवागमन बना रहता है।इसलिये उपवास का अर्थ सन्तचरणों से सत्संग से जान कर ही आचरण में प्रवृत्ति होने पर संसार राग नष्ट होगा और उपवास के चरम फल की प्राप्ति होगी।यह नाना इन्द्रियों की आहार शुद्धि भी उपवास का सूक्ष्मार्थ ही है। इसलिए “दास” की गुरुपीठ का,मलूकपीठ का उद्घोष है-
अर्थ विशुद्ध उपवास जु पाया।
जेहिं जरि जाय मूल यह माया।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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न पुनः जन्म जायते 

धारकोद्धारकः धर्मः सिद्धः साध्यश्च कीर्तितः।अग्नौ दाहकत्वे सति तदग्निः सिद्धपूर्वतः। अन्यथा यदि  शीतत्वं तदग्निः स्यात् कथं वद। एवं मनुष्यता धर्मः मनुष्ये यदि वर्तते।तन्मनुष्यः भवेन् नूनं साध्यधर्मो निगद्यते।मनुना मानवेन्द्रेण मनुधर्मः प्रकीर्तितः।तावत् प्राथमं कृत्यं मानुषे यत् शरीरकम् ।विवेकशीलता धर्मः ख्यातः साधुमानितः।
यदि विवेचिनी बुद्धिः मनुष्ये पूर्वसिद्धिता।
तदा विचारः कर्तव्यः सर्वस्मिन्कार्यकारके।

विचार्यैव कार्यं कर्तव्यं सर्वकाले पदे-पदे।
विचार्य कार्यकरणे मर्यादा भवति ध्रुवम्।।

मर्यादा यदि जायेत गुणा आयान्ति निश्चितम्। करुणा क्षमा सुशीलत्वं सारल्यं तोषकारिता। यद्येषः गुणगणः मनुष्ये व्यवहार्यते।तदेषः मनुजः नूनं वक्तुं शक्यमिति ध्रुवम्।अन्यथा वैपरीत्ये सति  मानुषो नैष कीर्तितः।
मानुषो धर्मश्च मर्यादा शिक्षिता साधुसम्मता।भगवता रामचन्द्रेण प्राकृतं योनिमास्थितम्।अतः परीक्ष्य कर्तव्यं सर्वकर्मसमुत्थिते।सार्थं जन्म हि तस्यैव न पुनः जन्म जायते।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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