न कोई अल्पज्ञ है, न सर्वज्ञ।
जो आप वही हम। जीव का जीवन नाना वन -वन नाना शरीर बन तब नहीं भटकता जब वह तुलसी कबीर मीरा रैदास जैसे भक्तों का चरणानुराग पा जाता है।
मैं क्या कोई भी रसो वै सः की एक कणी का स्वाद पा जाये,तब प्रेम मद छाके पग परत कहाँ के कहाँ, की दशा में चला जाता है।
सोचिये,जिन भगवान् की माया का विस्तार यह प्रपंच भौतिक जगत् है, वह कितनी सारहीन और मादक है, मोह में भोगों में इस जीव को डाले हुए हैं, वह जीव “उन्ही”की कृपा से गुरुमाध्यम से थोड़ी भी भगवद्रस मदिरा पी ले,तो उस भाग्यशाली जीव का क्या कहना। वह तो संसार के निर्माण करवाने वाले भगवान् में ऐसा भावित आकृष्ट होगा कि, संसार रस भोग भाग ही जाये। अरे नारायण! जब वह अपने प्रेमपाश में फँसा लें तब माया मोह निवृत्त। सदा आनन्द ही आनन्द।
इसलिए-
सदानन्दः जीवः जनितमायाजितकृपाकारणपरः।न पारं यातुं तत् परमगुरुकरुणान्धितधिया। अतः साध्यः सः प्रतिसमयसर्वत्रप्रसृतः।मुदा दद्यान् मुक्तिं हृदयकृपयाविष्टमनसा।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
http://shishirchandrablog.in