किसी व्यक्ति विशेष द्वारा कोई दिन विशेष घोषित करने पर सम्भव है, जिस क्रिया विशेष हेतु वह घोषित है,तद्दृष्टि जाने से तत् सृष्टि हो जाय।
किन्तु कोई लेख/विचार विशेष,केवल और केवल आवेश विशेष का परिणाम होता है।जब आवेश होता है, तब वह लिखवा लिया जाता है।बिना आवेश के कोई भी गद्य/पद्य उपहास पात्र बनता है, मम्मट ने तो यही माना है।आज इक्कीस जून दोहजार चौबीस, योग दिवस है।आज योग करने का महत्व विशेष है।
यानी कि आज से लेकर आगे सतत ऐसी प्रक्रिया में इस आसनादि को जारी रखना चाहिए। यही आज का सन्देश है।
योग तो शुद्ध रूप से आत्मिक प्रयोग है। दिखावे के लिए ही सही हो,लेकिन प्रेरणादायक और जागृति करने वाला तो होता है।
सूक्ष्म विचारणा में,देखिये तो यह
योगी भी अभिमानी होता है। अभिमान पुनः जन्मने का कारण है। अतः योग के समस्त आठों सोपान दम्भ में रखनेवाले हैं। तब क्या योग और तत् शास्त्र क्या दुरुपयोग हैं? ऐसा नहीं मानना चाहिए।वस्तुतः योगादिशास्त्र मानव धर्म पालन के अन्यतम चरण हैं। हम इसके द्वारा ईश्वर प्रणिधान,सत्य पालनादि को व्यवहार में लाकर एक अदद मनुष्य तो बन ही सकते हैं,जोकि चरमप्रयोजन सिद्धि का प्रथम प्रयोजन है।
योगः चित्तवृत्ति निरोधः इत्यादि वाक्यों से यह जानिये,कि यह चिद् वृत्ति,जो संसार राग मे,मायिक बन्धनों में हमें जकड़ रखे है,वह निवृत्त/नष्ट हो जाय। वह हमारा असली स्वरूप नहीं है। हमारा असली स्वरूप संसार भोग नहीं है, बल्कि संसार योग है। आमूल चूड यह जगत् ईश्वरीय आवास है। “ईशावास्यम् इदं सर्वम्”
अब योग की सार्थता यही है कि, यह जीव जगत् वासुदेवः सर्वं दीखने लगे। और योग के वर्तमान, आसन प्राणायाम आदि को करके हमें ऐसी योग दृष्टि नहीं मिलेगी। तब इसके लिये परमयोगीश्वर ब्रह्माण्ड गुरु की वाणी का प्रसाद ग्रहण करना पड़ेगा, जहाँ जाकर योग की गुत्थी सुलझेगी। नारायण!नारायण ने कहा- वासुदेवः सर्वमिति स महात्मातिदुर्लभः। और दूसरी ओर कहा- तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।
मतलब समझें कि किसी भी समाधि योगी की कृपा से उसी की तरह हमें भी समाधि में भगवान् सुलभ हैं।
लेकिन सर्वत्र भगवद् दृष्टि वाले सन्त/महात्मा दुर्लभ हैं।
अब समग्र गवेषणा से तथ्य निकला कि,सन्त दुर्लभ और भगवन्त सुलभ हैं।
योग से,और कहिये किसी योगी के निर्देशन में भगवत् तो दर्शन हो जायेगा।लेकिन कहिए कि इस योगदर्शन से जन्म बन्ध विनिर्मुक्ति हो जाये तो हम जैसे दास को यह सम्भव नहीं लगता। यह सम्भव है, केवल सर्वत्र सर्वं खलु इदं ब्रह्म वाले महात्मा की चरणरज में अभिषेकस्नान होने से।
अतः आज जिस योग का प्रयोग योगा के रूप में योग दिवस के रूप में मनाया जा रहा है, हो सकता है, यह क्रिया,मनुष्य बनने में मदद करे। लेकिन वास्तविक रूप में परम कल्याण और आत्म कल्याण तो,सियाराम मय सब जग जानी। करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी,वाले दृष्टिकोण के दुर्लभ सन्त महात्मा दे पायेंगे।और इस शरीर का चरम यही है कि, भवबन्ध टूटै।
अतः सद्गुरु शरणागति ही मुक्ति का एकमेव उपाय है। आज का योग मुक्ति नहीं देगा।अभिमान ऊपर से बढ़ायेगा।अतः,अर्जुन की तरह श्रीकृष्ण चरणों में गिर पड़ो,बस काम बन जायेगा।
भवबन्धन खोलें वही जिन्हे न माया मोह। यह संसार पड़ा हुआ कंचन कामिनि कोह।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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