मिलत रहत संसारो 

मन भजै रटै कैसे हरिनाम ये प्राकृतदेह  विचारो।
कैसे सतत हरी सुमिरै नर बात बुद्धि में धारो।
विन्ध्येश्वरीदास गुरुकिरपा निश्चय होय  हमारो।
सब आधार छाँड़ि पकरो गुरुपादपद्म स्वीकारो।
सन्त शरण चरणाश्रय मिलतहिं  देहगेह  विस्मारो।
प्राकृत देह बने अप्राकृत, गुरुकृपा नाम आधारो।
स्वस्वरूपनिष्ठित परिनिष्ठित गुरू ही ईश्वर सारो।
नामनिष्ठ गुरु देखि सहज तच्चरणकमल
स्वीकारो।
विकल अवस्था गमन आगमन नहीं देह मनुकारो।
होय कृपा पंकजपदगुरु कै जात गलत  संसारो।
नाम चलत है इसी देह से राम राम रतनारो।
बनै जाय यह पंचभूतनिर्मित अप्राकृत सारो।
यहै रहस्य यदाश्रय श्रयणे गलै कर्म सब छारो।
तबै लक्ष्य परिपूर्ण एहि तन समझो चाहे निकारो।
विना अनन्य आश्रय गुरुपद मिलत रहत संसारो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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