राम काज कीन्हे बिनु मोहिं कहां विश् राम।
भगवान् का माधुर्य गुण ही कृपा करुणा अनुग्रह अवतार लीला विस्तार का परम चरम सारभूत है।नहीं तो, उनके ऐश्वर्य स्वरूप को देख सकने की भी सामर्थ्य किसी देवी देवता को नहीं है।
अतः करुणासागर दीनदयाल और कृपानुग्रहविग्रह जैसे अपने ही नामों को सार्थक करने हेतु और रसिकों सन्तों भक्तों को आनन्द देने के लिए, उन अजन्मा का भी मानव जन्म हुआ है।
जब, करुणा कृपा अनुग्रह की नितान्त आवश्यकता को और कहिए अनिवार्यता को मनुष्य जीवन में दर्शाने के लिए भगवान् मनुज रूप धरते हैं, तब उनकी रसमयी लीला के लालायित अंजनी के लाल भी अपने लोभ का संवरण नहीं कर पाते हैं, और रामकाज लगि तव अवतारा सुनते ही,रामकाजरसिक वे पर्वताकारा हो जाते हैं।
अरे नारायण! सज्जन संरक्षण और दुर्जन विनाशन के मूल में भी उनकी कृपा और करुणा ही बरसती है, जब मारने गई मातृरूप पूतना का स्तन पान करते हुए उसके समस्त जन्मों का कालुष्य भी पीकर,माता से भी बढ़कर अनन्त मुक्ति लाभ से उसे कृतार्थ कर देते हैं। यह उनकी करुणा उत्स का निर्झर भी राम काज है।
राम काज तो नारायण! आनन्द ही आनन्द देना है, क्यों? क्योंकि इस आत्मा की मौलिकता देह लौलिकता न होकर,जो आनन्द सिन्धु सुखरासी है।
और-
आनन्द,आनन्द तो सत् चित् आनन्द में ही मिलेगा। नहीं तो सब सुखाभास हो सकता है। एतावता, ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े नायक की स्वभाव सिद्ध करुणा का प्रवाह अंशभूत अपने में आ जाय,जो कि पूर्वसिद्ध ही है, यही अपना वास्तविक स्वरूप है, यह भी रामकाज है नहीं तो और सब मायिक- राक्षस काज।रामकाज और राक्षस काज में निष्कामता और सकामता का विपरीत परस्पर विरोधी अन्तर है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
http://shishirchandrablog.in