भावमयी कल्पना

पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।दिव्यदिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।
यत्-कवेर्भाव-भावान्विता भावना।तत्क्रिया-कारिता विन्ध्यमातुःकृपा।।
यत् समाधेर्वैश्यस्य श्रीर्नाशिता।
भूपति-सुरथस्य राज्यं विराज्यं गता।।
विन्ध्य-नग-राज-राज्ञी समासाधिता।सर्वकामान् पुरे पूरयन्ती स्थिता।।
विन्ध्यगङ्गानदी-सङ्गमे राजिता।
विन्ध्यमाता मुदा कामदा राजते।।
एकरसानन्द-विद्या-संस्था-स्तुता।
दिव्य-चण्डी-शती-पाठ-पूजा परा।।
पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।
दिव्य-दिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।
अथ हर्ष-प्रकर्षं परां प्रौढिताम्।
श्रीकृपा-कारणाज्जातकामास्सदा।।
पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।
दिव्य-दिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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रामकाज

राम काज कीन्हे बिनु मोहिं कहां विश् राम।
भगवान् का माधुर्य गुण ही कृपा करुणा अनुग्रह अवतार लीला विस्तार का परम चरम सारभूत है।नहीं तो, उनके ऐश्वर्य स्वरूप को देख सकने की भी सामर्थ्य किसी देवी देवता को नहीं है।
अतः करुणासागर दीनदयाल और कृपानुग्रहविग्रह जैसे अपने ही नामों को सार्थक करने हेतु और रसिकों सन्तों भक्तों को आनन्द देने के लिए, उन अजन्मा का भी मानव जन्म हुआ है।


जब, करुणा कृपा अनुग्रह की नितान्त आवश्यकता को और कहिए अनिवार्यता को मनुष्य जीवन में दर्शाने के लिए भगवान् मनुज रूप धरते हैं, तब उनकी रसमयी लीला के लालायित अंजनी के लाल भी अपने लोभ का संवरण नहीं कर पाते हैं, और रामकाज लगि तव अवतारा सुनते ही,रामकाजरसिक वे पर्वताकारा हो जाते हैं।


अरे नारायण! सज्जन संरक्षण और दुर्जन विनाशन के मूल में भी उनकी कृपा और करुणा ही बरसती है, जब मारने गई मातृरूप पूतना का स्तन पान करते हुए उसके समस्त जन्मों का कालुष्य भी पीकर,माता से भी बढ़कर अनन्त मुक्ति लाभ से उसे कृतार्थ कर देते हैं। यह उनकी करुणा उत्स का निर्झर भी राम काज है।
राम काज तो नारायण! आनन्द ही आनन्द देना है, क्यों? क्योंकि इस आत्मा की मौलिकता देह लौलिकता न होकर,जो आनन्द सिन्धु सुखरासी है।

और-
आनन्द,आनन्द तो सत् चित् आनन्द में ही मिलेगा। नहीं तो सब सुखाभास हो सकता है। एतावता, ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े नायक की स्वभाव सिद्ध करुणा का प्रवाह अंशभूत अपने में आ जाय,जो कि पूर्वसिद्ध ही है, यही अपना वास्तविक स्वरूप है, यह भी रामकाज है नहीं तो और सब मायिक- राक्षस काज।रामकाज और राक्षस काज में निष्कामता और सकामता का विपरीत परस्पर विरोधी अन्तर है।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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संसार-कथा-व्यथा 

मानो, मानव का जीवन है भगवत्कथा। और संसार की सब कथा है व्यथा।।

यह मनुज तन मिला पूर्ण सत्संग हित।ये कथा ही है सत्संग और सब अहित।

मान लो प्रेमियों जीव जीवन कथा। क्या गवाँओगे अवसर वृथा ही वृथा।

मानो, मानव का जीवन है भगवत्कथा।और संसार की सब कथा है व्यथा।।

श्यामाश्याम की कथा कर्ण कुहरों भरो।
मत करो व्यर्थ जीवन अहं ना करो।।

जानकी के अनुज की कथा में बहो।
जानकीनाथ गुन सुन, उनको गहो।।

मानो मानव का जीवन है भगवत्कथा।
और संसार की सब कथा है व्यथा।।

नहीं होता किसीका आगे पतन।भक्त भगवत कथा में लगे जब ये मन।।

भक्त भगवत कथामृत में रहें जब मगन।
लक्ष्य पूरित हो नर तन हरी के शरन।।

मानो मानव का जीवन है भगवत्कथा।
और संसार की सब कथा है व्यथा।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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मिलत रहत संसारो 

मन भजै रटै कैसे हरिनाम ये प्राकृतदेह  विचारो।
कैसे सतत हरी सुमिरै नर बात बुद्धि में धारो।
विन्ध्येश्वरीदास गुरुकिरपा निश्चय होय  हमारो।
सब आधार छाँड़ि पकरो गुरुपादपद्म स्वीकारो।
सन्त शरण चरणाश्रय मिलतहिं  देहगेह  विस्मारो।
प्राकृत देह बने अप्राकृत, गुरुकृपा नाम आधारो।
स्वस्वरूपनिष्ठित परिनिष्ठित गुरू ही ईश्वर सारो।
नामनिष्ठ गुरु देखि सहज तच्चरणकमल
स्वीकारो।
विकल अवस्था गमन आगमन नहीं देह मनुकारो।
होय कृपा पंकजपदगुरु कै जात गलत  संसारो।
नाम चलत है इसी देह से राम राम रतनारो।
बनै जाय यह पंचभूतनिर्मित अप्राकृत सारो।
यहै रहस्य यदाश्रय श्रयणे गलै कर्म सब छारो।
तबै लक्ष्य परिपूर्ण एहि तन समझो चाहे निकारो।
विना अनन्य आश्रय गुरुपद मिलत रहत संसारो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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