प्रेम के अधीरे

चली थी चलेगी उमर धीरे धीरे।
बनो रामचरणों के प्रेम के अधीरे।।

न जाने है कितने जनमों का जाना। लगा ही रहेगा ये आना ये जाना।।जाना उसी ने सरेण्डर हुआ जो। गुरू भागवत के अण्डर हुआ जो।।सभझो भी तुलसी कबीरों की रहनी। रैदास मीरा और सूरों की सहनी।। बिना इनके चरणों भजन ना बनेगा। इन्ही के शबद से ही सब कुछ मिलेगा।। नहीं तो भजन की पहेली न सुलझे। नहीं अब भी समझे रहो तूँ भी उलझे।।
आचार्य शंकर की निकली है बानी।
सत्य प्रेम करुणा में रससिक्त सानी।।

(गतवति वायौ देहापाये भार्या विभ्यति तस्मिन् काये)

देह तो चली जल अगिनि के हवाले।
हटे प्राण वायू कौन इसको सँभाले।
पत्नी जो करती देह से स्नेह मानो।
अटल प्रेम आत्मा से मानो औ जानो।
यही बात निकली वेदव्यास मुख से।
अरे मनुज मानो रहोगे तूँ सुख से।।

(प्रेष्ठो भवान् तुनुभृतां किल बन्धुरात्मा)

परम प्रेम हे कृष्ण सभी के शरीरों में।
हटा अपनी माया रखो हमें धीरों में।।

सभी का शरीरों से सत् प्रेम होता।
असली है सत् प्रेम सब में जो सोता।।

ऊलझी ये करमों की डोरी न सुलझे।
पड़ो सन्त चरणों में रहोगे न उलझे।।

ये गीता की बानी पुराणों की बानी।
करो प्रेम सबसे निरतिशय ही मानी।

चली थी चलेगी उमर धीरे धीरे।
बनो रामचरणों के प्रेम के अधीरे।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
http://shishirchandrablog.in

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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