क्षणिकाः

रसना रस राम राम कौशल्या के सूनु राम।
बार बार रटत राम होत जनम पूर्ण काम।

कृपा के निकेत और रघुपति के दूत तुम,बन्धु हो विपन्नों के परम विराम हो।दुखित जनों के कष्ट हरते हे! कपीराज वायु के सुपुत्र तुम्हें सतत प्रणाम हो।।

निश्चय ही सिद्ध होता सब असम्भव कार्य है।धरे ध्यान कृपा उनकी मिलता क्या नहीं है।वे ही वानरेश करें रक्षा साधु सन्तों की।हैं कृपालु चित्त कृपाशीलता ही कार्य है।

श्रेष्ठ शिखर विन्ध्याचल का है, जहँ शिखर राजती नित्य भवानी। आर्यशरण्या जगन् मातृका ,रक्षा वरदा है वरदानी।

करते अमंगल का ध्वंस विध्वंस मुदा। महाबली क्लेशहर्ता शरणागतरक्ष सदा।
भूमिसुतासीतापति राम में अनुरक्त रहते। स्मरते वायुसूनु तुम्हे कृपा आलय कहते।

जिनकी कृपा के लेशमात्र होते पूरे काम। आद्याशक्ति विन्ध्यस्थित दुर्गा भजूँ आठों याम।

भक्तों के सकल कष्ट सतत तुम हरते। पंचानन केसरी कपि क्या न तुम करते। पारावारकृपा के प्रभु तुम्हें हम भजते।
राम राम स्मरते तुम श्वास श्वास रहते। जनरक्षा प्रतिक्षण मंगल ही करते।
वायुसूनु शिवस्वरूप रामदूत जयते।

विन्ध्याचल सविशेष कान्त उन्नत अधित्यका राजित।अष्टभुजा माँ
सरस्वती किया तूँने कंस पराजित।
शुम्भ निशुम्भ दैत्य द्वय दुर्धर,किया विनाश मात्र क्षण में।धरती गगन सकल त्रिभुवन हे वैष्णवि! चरती कण कण में।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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