सर्वाधाराभूतस्था सर्वानन्देतति कथ्यते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
जय सियाराम
मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती में कुल तेरह अध्याय हैं। पंचम अध्याय में नाना रूपो़ में देवी की स्तुति करते हुए उन्हें प्रत्येक रूप में अवस्थित बताया गया है। हर मन्त्र के अन्त में नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः कहा गया है। चार बार आये हुए इस नमन का बड़ा रहस्य है।इस प्रकार के-
नमः तस्यै नमः तस्यै नमः तस्यै और नमो नमः के प्रति स्थूल सूक्ष्म कारण और कारणातीत का दर्शन एक आध्यात्मिक अनुभूति है। बिना तद् आकार आकारित चित्तवृत्ति के ,ऐसे स्तर की प्राप्ति सम्भव नहीं है।
किन्तु इन चार प्रणामों का निवेदन, इसलिये भी है कि,साधक सद् रजस्तम से ऊपर,उसके पार चला जाये। त्रिगुण में रहना यह तो है त्रिप्रणाम है।और चतुर्थ नमो नमः द्वारा गुणातीत चतुर्थ स्तर में अवस्थिति है। विशुद्ध सत्व प्राप्ति की स्थिति है। क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता,तो ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन, जैसी बात कहते ही क्यों।
चतुर्थ प्रणाम तुरीय चैतन्य में निरन्तर स्थिति की अवस्था है,जो सत् चित् और आनन्द दशा है, जिसकी प्राप्ति नही करनी है, क्योंकि यह स्वतः प्राप्त है। ज्यों ही साधक त्रिगुण के पार हुआ कि, स्व स्वरूप मिल गया।और त्रिगुण मायिक प्रकृति का बाध तो नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै से हो जाता है।अब नमो नमः तो स्वतः गृहीत है,यही नित्य लीला लीन सच्चिदानन्दावस्था है।
तव च का किल न स्तुतिरम्बिके,सकल शब्दमयी किल ते तनुः।इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे,जगति जातम् अयत्नवाशादिदम्।स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन काल कलास्ति मे,ऐसा दर्शन देने और स्वयं ऐसी दशा के अनुभोक्ता परम अभिनव और नाम से भी अभिनव अभिनवगुप्त पादाचार्य ही हो सकते हैं, जो तुरीय चैतन्य की अभिनव तदाकाराकारितचित्तवृत्ति की दशा के साधक हैं।हम जैसे अविद्या माया ग्रस्तों जैसे नहीं। अतः स्वस्वरूपावगति यानी कि स्वात्मज्ञान की प्राप्ति ही,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः का उपनिषद् है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्