श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।
आकल्प काल कल- कल चल-चल चिर कर्मभूत यह भ्रमण रोक हे वानी।
ज्ञान उपासन भगति त्रिवेणी पावित पय आचमन स्नान हो कल्यानी।
विधि लिखे भाल पर भोग काल तव कृपाग्रस्त हो अस्त जाय ब्रह्मानी।
हो सतत नाम जप हरिस्मरण गल प्रबल कर्म विधिवानी।
बने न नूतन कर्मभोग्य हो योग्य दास रोको इसकी मनमानी।
है चला जहाँ से वह सत चित आनन्द अचल अविकल दें दानी।
इस देहपिण्ड में सुप्रतिष्ठ यह निष्कल हो अकलंक कृपा की खानी।
हे शारद तव करुणा वत्सलता स्नेह वारि वारिद बरसे वरदानी।
श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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