श्रवण मनन निदिध्यासन अर्थात् भगवान् के नामगुणादि का श्रवण,मनन और बार बार उसी पर, दृढ-दृढतर-दृढतम हो जाना ही वास्तविक मनोरंजन है। इसके अलावा संसार मनोरंजन तो छलावा है।यह भी सही है कि,ऐसा मनोरंजन,ऐसे महात्मा सन्त सद्गुरू ही दे सकैं,जो ऐसा ही मनोरंजन करते हुए, परम सरल शान्त चित्त हो गए हैं।
नारायण, देखिये-
जिसको समाज की लोकभाषा में मनोरंजन कहा जाता है, वह मनोरंजन हो ही नहीं सकता। क्योंकि इन्द्रियाणां च मनश्चास्मि, कहनेवाले ब्रह्माण्ड गुरु ने गीता में,सभी इन्द्रियों में स्वयं को मन कहा है।जब मन,श्रीरामकृष्ण हरि हैं, तब इन्हीं में अपने का रंजन,मनोरंजन सिद्ध होगा,अन्यत्र नहीं।और आत्मनि एवात्मना तुष्टः, जैसे गीतावाक्य की संगति भी सही होगी।मनोरंजन पारमात्मिक है।
मनोरञ्जन सर्वथा आत्मिक है।
मनोरञ्जन, मनोरञ्जन नहीं है, जो संसार भोग धन मान कामना परक है।इसलिये, मनुष्य का मनोरंजन-मन्मना भव मद् याजी,जैसे परमगुरुगीत गीतावाक्य में निहित है, जो किसी का भी वास्तव हित है।
नारायण, मन का रंजन अर्थात्,रंगना ,सब कुछ अनुकूल हो जाना तो परम शिव की परम कल्याण की प्राप्ति ही है।नहीं तो-
यजुर्वेद क्यों कहता-तन् मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।मेरा मन परम कल्याण में दृढ हो जाय।यह मन परम कल्याण अर्थात् ,परमात्मपरक हो जाय। और यह भी है कि यह मन तो , सरकते दरकते संसार में दर-दर भटकाते ही रहेगा, जब तक कि-
एकमेव केवल अपने कहे जाने योग्य परमात्मा में स्थिर नहीं होगा।
मन को स्थिर करने के लिये श्रीकृष्ण ने-
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते,
कहकर भगवन्नाम जप अभ्यास करने का आदेश किया है। यह नामजपाभ्यास ही संसार में भटके मन को वहाँ से हटाकर, स्वतः संसारवैराग्य दे देगा।
संस्कृत व्याकरण शास्त्र में एक संज्ञा होती है, जिसका नाम है(अभ्यास संज्ञा)
वहाँ भी अभ्यास का मतलब है, एक बार कहे गये शब्द को दुबारा कहना। योगशास्त्र में भगवान् पतञ्जलि ने भी- अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः,कहकर मन की स्थिरता का कारक इन्हीं अभ्यास और वैराग्य को ही बताया है। इस प्रकार से मानव मन का रंजन यानी कि मनोरंजन एकमात्र भगवन्नामावलम्बन करके भव भंजन कर देना ही है।
दूसरे दृष्टिकोण से मनुष्य का यही राम रामकार्य है।जब रामकृष्णनारायण ही आनन्दरूप हैं, तब मन इन्ही भगवान् के नामगुण कीर्तन में विश्रान्त होकर मन के आनन्द (रंजन) का कारण बनता है, बन रहा है, और बनेगा भी,यह त्रिकाल में अबाधित सत्य है। ऐसा ही मनोरंजन राम काज है, जिससे परम सन्तोष और परम कल्याण का ग्रहण हो।
रामकाज का अर्थ, ब्रह्मचर्यादेव परिव्रजेत् भी है। और गार्हस्थ्य पालन कर सन्तति परम्परा विस्तार भी है-भै गलानि मोरे सुत नाहीं।
इस तरह,इस प्रकार के रामकाज में,तो
गृहस्थ होकर, सृजन सन्तति प्राप्ति,तक ही स्वपरिणीता को सकाम भाव से देखने का निर्देश है।अन्यथा.. कामिनी और काञ्चन में सकामता का भाव संसार ही देंगे, क्षणिक मनोरंजन ही देंगे।
एक मृग के कारण भरत जैसे महायोगी, ब्रह्मादि लोक तक विचरणशील,महात्मा भी पतन को प्राप्त हो जाते हैं।
हमारे जैसे लोभी विषयी की बात क्या है। अतः मनोरञ्जन एकमात्र रामकथा ही है।
मनोरंजन एकमात्र भगवन्नामगुण चिन्तन ही है।
काम कथा या संसार कथा नहीं। और इस मनोरञ्जन के लिए तो सदा, सतत श्रीरामनामामृत पान करना पड़ेगा।वे लोग ही इस संसार में धन्य-धन्य हैं, सब प्रकार से कृती पण्डित और ज्ञानी हैं, जो निरन्तर नामनिष्ठ जीवन जी रहे हैं। अन्था, अन्य कोई मार्ग भी नहीं है, इस कलिकाल में।
नान्यः पन्था विद्यते अयनाय।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
http://shishirchandrablog.in