वृन्दावन की होरी

हरी हर वृन्दावन की होरी।हरी हर वृन्दावन की होरी।
पानीघाट कल ह्वै गइ होरी सदगुरु दियौ थपोरी।
आज मलूकपीठ मां होरी रस बरस्यौ नहिं थोरी।
प्रतिपद तिथि दोहजार इक्यासी विक्रम खाक चौक होगी होरी।
गावत सदगुरु मोद बढ़ावत
शिष्य जनन को अति हरषावत। शिशिर हेमन्त गै आय बसन्तहिं मन कीन्ह्यौ है चोरी। हरी हर वृन्दावन की होरी। हरी हर वृन्दावन की होरी।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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