करो हे ईश तुम पूरी

मुझे लगता यही मित्रों दयानिधि रीझते मानो।

जो उनकी सृष्टि का सेवक न चाहे कुछ भी पहचानो।

बने अनचाह जो जन हैं।

सफल उनका मनुज तन है।

रही यदि कामना कोई।

करम बस आयेगा वो ई।

कृपानिधि का कृपानुग्रह।

नहीं अब कुछ रहा  आग्रह।

बड़ाअभिलाष यह मेरा।

न होये करमबस फेरा।

बने निष्काम यह जीवन।

मिला मानव का सुन्दर तन।

कराओ जगत सेवा विभु।

स्वयं के चरण  की तूँ  प्रभु।

न हो धन मान की आशा।

यही है मेरी अभिलाषा।

तरसता मनुज बनने को।

अरे भटकाया अपने को।

अनगिनत जन्म का भटका।

लो अपने चरण में  अटका।

जगत सेवा की मजदूरी।

करो हे ईश तुम पूरी।
यही सेवा की मजदूरी।

करो हे महागुरु पूरी।

करो हे महागुरु पूरी।

करो हे ईश तुम पूरी।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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