राधापतेः पादयोः

संसार रंगो रूपों में दीखता है।क्षण क्षण बदल रहा है।इसके रंगरूपों में यदि,गुरु  भागवत भक्तकृपा से मीरा की तरह कृष्ण ही दीखें,तो बात बने।नहीं तो संसार तो बिगड़ने बिगाड़ने के लिये होगा।विचाराचार केवल शुद्ध होगा हरिहर नाम जप स्मरण से,कलिकाल में कोई और रास्ता नहीं है।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।

काल की प्रतीक घड़ी पल पल चल रही  है।इसमें मूल्यवान नाम ही है, हरिहर का।और सत्य तो यह है कि श्वास प्रश्वास ही  वास्तविक घड़ी है।हर सांस में शिवाशिव  सीताराम राधाकृष्ण चलेगा, नियत और नियति की क्या चलेगी,वह खुद बखुद ही बदल जायेगी,जो भी पूर्वतः निश्चित शरीर   का प्रारब्ध भोग होगा। इसी बिगड़ी सुधार कार्य के लिये ही करुणानिधि ने करुणा करके,यह मानव शरीर दिया है।
कबहुँक करि करुणा नर देही।देत ईश बिनु हेतु सनेही। और नहीं तो फिर आने जाने का चक्कर बरकरार।
जो विद्या पढ़ी,रोजी रोटीवाली। क्या हो गया,उससे सिवाय अहंकार बढ़ने के।धन मान पद पदार्थ कामिनी कांचन की कामना और भी सुरसा की तरह वढ़ती ही गई।
और विचार करने पर लगा कि जगद् अनुराग प्रीति बढ़ने से हम जिस आत्म स्वरूप को जानने और जानकरके कर्मतः जन्म ग्रहण रोकने के लिये,मानव देह पिण्ड पाये थे,वह एक बार फिर बेकार ही गया।
  इसलिये पढ़ी गई रोटी वाली विद्या तो सा विद्या या विमुक्तये वाली विद्या नहीं बन पाई।
और कहिये कि, यह विद्या, अविद्या ही हो गई।
  अतः साधुसंगसंगति ही संसारसंग भंग करके, पढ़ी गई विद्या को अविद्या होने से,बचा लेगी,यही त्रिकालाबाधित सत्य है।इसीलिये, भगवच्चरणारविन्दमकरन्द गन्धग्रहण के ग्रहिष्णु साधकों से प्रीति बढ़े,इसी कामना के साथ-
विद्या यच्चरणेषु भावय यदि प्रीतिः मुकुन्दस्य वै। अन्यत् स्यात् कलये मनो विपदि तन् नूनं ह्यविद्यायते। सा विद्या नु भवेदितो यदि जगन्मुक्त्यै समाधीयते। साधुः साधय मां स्थिरमनाः राधापतेः पादयोः।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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