कालपतिंवरा

भावुक भावपूर्ण भावना शब्दों में। घण्टाभक्त था शिव का नहीं अब्दों में।यही समस्या जीवात्मा कीअतिविकट है। भक्ति में भगवदतिरिक्त चाहना ही संकट है। हम धन मान कामिनी कांचन दास बने घूमते। गुरू भागवत कृपा हो जाय तो ही कटे फास सबके मते।
भक्त देता भक्ति असली, भक्तों की माला कहती। जैसे विषयी संग मिलती विषय जलधार बहती। ओङ्कार युक्त शिवाय वाचन कथ्य उपवीती सदा। अनुपवीती शिवाय नमः कहै यही योग्य सर्वदा।

तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती। सहस नाम सम सुनि पिय बानी जपि जेई पिय संग भवानी।

एक सौ छब्बीस साल के सन्त तुलसीदास कावैष्णव अतुल अतुलसीवाणी का प्रसाद श्रीरामचरितमानस तो जगद्विषाद और अवसाद सादन करता ही है।
मन्त्र महामणि विषय ज्वाल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।
सीता विनीता घृतचित्तवीता। भिन्नाप्यभिन्ना ननु रामशक्तिः।।कालस्य देशस्य परार्थचिन्ता।अचिन्तनीयप्रभवा विजेत्री।सा कालिका कालविधानकर्त्री, जीवांश्च सर्वान् परिपालयन्ती।मोदंविधात्री चिरकालशान्तिं,पायात् सदा काल पतिं वरा वै।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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