किसी भी क्षेत्र के शाखा के विद्वान्/पारंगत की पढ़ी गई विद्या तो अविद्या माया को ही पुष्ट करती है। इसलिये स्वयं की विद्या रूपी वधू को अविद्या माया के आवरण से मुक्त करने और विद्या स्वरूप में स्थिर रहने के लिए, हरिनाम स्मरण/जप के सिवाय और कोई साधन नहीं।
इस नामरूपपति के बिना,पढ़ी हुई विद्या, अविद्या है।यह स्वगत विद्या, अविद्या न बने, मायात्व ग्रहण करके पतिहीना विधवा न बन जाय, इसके लिये इसके पति को हरिनाम की शरण ग्रहण करनी चाहिए।
अतः सभी सनातनप्रेमियों को हरिनाम का साधनस्मरण करके अपनी पढ़ी गई विधवाविद्या को सधवा बनाना पड़ेगा।
इसका प्रकाश और प्रमाण हमें श्रीचैतन्य महाप्रभु के जीवन से मिलता है।
बंगधरती पर पन्द्रह सौ ईशवी में अवतरे, श्रीमच्चैतन्य महाप्रभुजी के नामसंकीर्तन से,जंगली शेर भालू भी तरे।
अरे,नारायण मनुष्यों की बात ही छोड़िये। श्रीरामकृष्ण नाम संकीर्तन से महाप्रभुजी ने ऐसी,प्राणवायु फूँकी,जो इस संसार में जन्मे और मृत्युभँवर में फँसे नाना जीवों को सदा सदा के लिए, अनन्त प्राण ही दे दिया। और समझने की बात यह भी है कि, वस्तुतः इन कलिमलग्रस्त प्राणियों का उद्धार करने हेतु और श्रीजी के मादनाख्य भाव का अनुभव करने हेतु श्रीकृष्ण ने महाप्रभु चैतन्यदेव के रूप में,कराल कलिकाल में अवतार ही ले लिया था। सन्तमण्डली की यही सनातन मान्यता है। महाप्रभु जी ने तो केवल नामसंकीर्तन मन्त्र ही सुनाया,बहुत विद्या भी नहीं पढ़ी और न ही बड़े ग्रन्थ ही रचे।
अपनी समग्र जीवनलीला में आपने केवल आठ संस्कृत छन्दों की रचना की, जो कि एक से बढ़ कर एक हैं। यह आठ पद्य सनातन धर्म जीवन की संजीवनी है।
इसकानाम शिक्षाष्टक है। यह ललित उदात्त भावगम्भीर पद्य रसिकभक्तजगत का हृदय ही है, जहाँ नाममहाराज राजते हैं। सम्पूर्ण पद्य इस प्रकार है-
चेतोदर्पणमार्जनम् भवमहादावाग्नि-
निर्वापणम्।श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणम् विद्यावधूजीवनम्।आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।
इस संस्कृत छन्द में श्रीकृष्णसङ्कीर्तन विशेष्य पद है।इस श्रीकृष्णसङ्कीर्तन, विशेष्य का मतलब है, कि हरिनाम को सम्यक् भाव रस पूर्ण अवस्था में उच्च स्वर से कहा जाना है, क्योंकि उच्चैः भाषा तु कीर्तनम्।अब, इस नाम के संकीर्तन की विशेषताएँ क्या हैं। इसके लिये महाप्रभु जी ने नामकीर्तन के आठ विशेषण दिये हैं। ये विशेषण हैं-
1-चेतोदर्पणमार्जनम्।
2-भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।
3-श्रेयःकैरवचन्द्रिकाविरतणम्।
4-विद्यावधूजीवनम्।
5-आनन्दाम्बुधिवर्धनम्।
6-प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।
7-सर्वात्मस्नपनम्। और
8-परम्।
इसमें विजयते,यह क्रियापद है।जिसका भाव है कि, यह नाम ही सर्वत्र,सब काल और सभी,समस्याओं पर परम विजय दिलाने वाला है।
अब क्रमशःआठों विशेषणों मीमांसा इस प्रकार है-
1- यह भगवन्नाम तो, चित्तरूपी दर्पण पर नाना जन्मों शरीरों की चढ़ी मढ़ी जमी कामादि की मोटी काई को हटाकर, चित्त को साफ कर देता है। कामादिवासना हटने पर,संसार वासना नष्ट होगी और स्वात्मस्वरूप भगवत्स्वरूप दिखने लगेगा। यही तो,इस जीव का चरम परम लक्ष्य ही है।
2-भवति लीयते भूयते लयते यत्र सर्वं जगज् जातम्। जहाँ संसार और सारी संसारी वस्तुएं उत्पन्न और विनष्ट होती हैं, उसे भव कहा गया है। यह वस्तुएं यहाँ लगी हुई कामना/वासना की प्रचण्ड आग में जल जल कर समाप्त हो रही हैं। इस संसार की लगी कामादि की जला देने वाली आग बुझाने और इससे बचने बचाने का उपाय हरिनाम है।
3- सभी जीव जगत् और विशेषतया इस मनुष्य के लिये स्वीकार योग्य दो मार्ग हैं।
एक है श्रेय और दूसरा प्रेय। नचिकेता और यम संवाद में इस श्रेयप्रेयमार्ग का विस्तीर्ण वर्णन है। श्रेय मार्ग नाना लोकों की स्वर्गादि सुखसामग्री का भोग का मार्ग है। जिससे नाना शरीर धारण करके बार बार जन्म मृत्युभँवर में रहना होता है, चाहे वह स्वर्गलोक हो ब्रह्मा का लोक।
दूसरा मार्ग श्रेयमार्ग है।यह इन लोकों के भँवर से बचने का मार्ग है।इसका ही वरण वरदान रूप में नचिकेता ने किया था।
अब देखिये कि यह हरिनाम का कीर्तन श्रेयमार्ग यानी की पतनमुक्तिमार्ग पर चलने वाले जीवों को उसी तरह से है जैसे कुमुदिनी के लिये चन्द्रमा की चाँदनी।
चन्द्र के उदित हुए बिना कुमुदिनी का विकास उल्लास सम्भव ही नहीं है। इसी तरह यह भगवन्नाम संकीर्तनस्मरण मुक्ति कामी जीवों का सतत उदय और उल्लास है,जैसे कि कुमुदिनी के लिए चन्द्रमा।
जगत् का चन्द्रमा तो अस्त होगा,और कुमुदिनी मुरझा जायेगी लेकिन यह नाम ऐसा चन्द्रप्रकाश है, जो जीव को श्रेयपथ पर जाने और चरम तक जाकर विशेष रूप से तर जाने का अनुमप प्रखर दीप्त तेजःपुंज है।यह तो ऐसा है कि जीव को तार कर ही मानेगा। इसीलिये इस नाम को चन्द्रिकावितरणम् कहा।
4- यह विद्या रूप वधू का जीवन, माने कि पति/स्वामी है।
5-यह आनन्दाम्बुधिवर्धनं है। मतलब कि आनन्द का ऐसा महासागर जो आनन्द को कभी भी कम नहीं होने देगा। नाम को आनन्द का महासमुद्र कहा गया।इसीलिये गोस्वामी जी ने इस रामनाम को कहा-
जो आनन्दसिन्धुसुखराशी…
6- यह रामकृष्णनारायण नामाक्षर अक्षर प्रतिपद उच्चारण करने पर, प्रत्येक ही नामपद सतत वर्धमान सम्पूर्ण अमृत का आस्वादन है।
इसे पान करके मृत होने का प्रश्न कहाँ।
7- यह नामसंकीर्तन तो ऐसा है कि जो सारे मनुष्य और मनुष्येतर जीव जगत की आत्मा का स्नान ही है। जलस्नान तो शरीर शुचिता देगा,लेकिन यह नाम तो सारी आत्माओं को भी स्नान कराकर संसार सागर से तार देगा।
8- यह परम् है। अपरम् नहीं। वस्तुतः परं का मतलब है कि, यह पूर्ण परात्पर ब्रह्म है।
नारायण ऐसे ही क्षीयमाण जीव जगत या कि अष्टधा प्रकृति से अविद्या से माया से पार जाने का एकमात्र साधन यही राम हरिकृष्णनारायण नाम ही है।
तरेगा भवमहासागर अगर ले रहा सतत हरिनाम। अव्यर्थ अमोध रघुपति बान जैसा बनेगा सब काम।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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