अहो बत श्वपचोतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।तेपुः तपःते जुहुवुः सस्नुः आर्याः ब्रह्मानूचुः नाम गृणन्ति ये ते।
श्रीमद् भागवत-3/33/7
अरे,नारायण भागवत पुराण में मैत्रेय के वचनों द्वारा,यह अद्भुतव्यासवाणी है। इसके अर्थ में अवगाहन स्नान करके,क्या आनन्द आता है।
कितने आश्चर्य की बात है कि,भगवान् के हरिकृष्णनारायण नामों का उच्चारण करनेवाला चाण्डाल भी ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है, क्योंकि उसकी जीभ पर तुम्हारे नाम का आस्वाद है। ऐसे व्यक्ति ने सारे तपों का तप कर लिया है।सारे यज्ञों को सविधि सम्पादित कर लिया है।समग्रतीर्थों में स्नान कर लिया है।सभी वेदों का भी स्वाध्याय भी पूर्ण कर लिया है। इसकी मीमांसा देखने योग्य है।
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तुभ्यम् इति पदे चतुर्थी विभक्तिः। कर्मणा यम् अभि- प्रैति स सम्प्रदानम्/सम्प्रदाने चतुर्थी। ये दो सूत्र भगवान् पाणिनि के हैं। प्रथम सूत्र यह बताता है कि,अपनी दान क्रिया द्वारा जो दान का कर्ता है,वह जिसका सर्वथा सामीप्य और अनुग्रह पाना चाहता है,वह अनुग्राह्य दानग्राही सम्प्रदान संज्ञक है।
दूसरे सूत्र से सम्प्रदान संज्ञक में चतुर्थी विभक्ति हो जाती है-
जैसे- राजा विप्राय गां ददाति।
अब,देखिये श्लोक में – तुभ्यम् पद में सम्प्रदानत्व/चतुर्थी का क्या अर्थ घटता है। यहाँ स्पष्टतया,वाक्य में-
नामजपकर्ता कर्ता है।वह अपने नामजप की क्रिया द्वारा तुभ्यम्,मतलब कि, सम्प्रदानसंज्ञक श्रीभगवान् का सर्वथा सामीप्य/अनुग्रह चाहता है।अथवा नाम दान करके,उन नाम को पाने वाले रामकृष्णनारायण को अभिप्रैति माने प्रसन्न करना चाहता है। इस तरह, नाम लेकर नामग्राही, भगवान् को ही नाम दान कर रहा है।और इस अपने नाम को ही लेकर/पाकर श्रीरामकृष्णनारायण प्रसन्न होते ही हैं, निस्सन्देह।इतिहास पुराणों में देवर्षिनारद-ध्रुवप्रह्लादादि नाना प्रसंग इससे भरे हैं।
द्रष्टव्य है कि ,नामजपकर्ता कर्ता नाम के सम्प्रदान से रामकृष्णनारायण को ही उनके इन्हीं नामों से प्रसन्न कर दे रहा है।वह नाम लेने वाला नाम दान कर रहा है।दाता जीवात्मा,और आदाता परमात्मा है। अपने ही नाम को पाकर,उस दाता को अपना सामीप्य देकर अभय कर दे रहा है। चाहे वह कोई हो। इस नाम की महिमा अद्भुत है। श्रीमद्वल्लभाचार्य ने सर्पयोनि में पड़े जीव का उद्धार कर दिया।देखिये तो,चैतन्यदेव ने वनचारी सिंह जैसों कोभी नाम सुनाकर तार दिया। क्या है, हरिनाम का ऐसा अतुलित बल,जो मनुष्येतर को जन्मपाश से मुक्त कर दे रहा है। मनुष्य की तो बात ही और है।
वाह,क्या देववाणी का सारगर्भित अर्थ है।
भगवान् को कुछ भी नहीं चाहिए, अपने नाम के सिवाय।
आखिर, जगत् उन्हीं का बनाया है। सब चराचर की समस्त वस्तु उन्ही की है।हमारी अपनी कौन सी वस्तु है, जिसे हम
उन्हें देकर,प्रसन्न कर सकते हैं।
नाम भी उनका,हम भी उनके,हमारा अपना क्या है। हाँ यह अवश्य है कि,
वे अपना नाम स्वयं/स्वतः नहीं ले सकते।
बस इसी में, नाम के उच्चारण में इस दासभूत जीव का वैशिष्ट्य है। वैसे सब उन्ही का उच्छिष्ट है,यह जीवजगतमात्र।
रामनाम सिवा क्या कर सकता हूँ अर्पण। बिम्ब आप प्रतिबिम्ब जीव प्रभुमेरे दर्पण।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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