आता जाता नहीं

भगवान् के भक्तों का भाव वे समझें या उनके प्रेमी भक्त। समग्र आस्तिक समाज
हमारी दृष्टि में प्रेमी भक्त है।कौन किसका क्या कहाँ का भाव है, यह तो वही अमित भाव प्रभावशाली ही जान सकते हैं,जो भाव रूप बन कर शब्दों में बह जाते हैं।  वे रामजी जैसा जैसे जब  चाहें अपना अर्थ यानी कि अपने को,शब्द रूपा जगदम्बा जानकीरूप में नव नवाकार दे सकते हैं।
गिरा अरथ जल बीचि  सम,कहियत भिन्न, न भिन्न।बन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न।
संसार के आवागमन से खिन्न यह जीव जगत् का अनुपम व्यक्त रूप मनुष्य जीव जिसमें,आत्मा परमात्मा का परम प्रकाश सर्वाधिक मात्रा में रहता है, वही सर्वदा के लिये कृतार्थ हो जाने वाली प्रकृति की अनुपम कृति है। श्रीसीताराम को यह ममता अपने इसी जीव और जीव मात्र पर भी है, जिन्हें गिलहरी पर भी दयाशील होते  देखा गया है।इन्हे दीन ही परमप्रिय  हैं,क्योंकि दीनबन्धु दीनदयाल और   दीनानाथ जो ठहरे।
भगवान् श्रीसीताराम कहने के लिए और  देखने के लिये श्रीसीता और राम रूप में अलग हैं। नहीं तो अचिन्त्य असीम युगल का,जब मन ही एक है, तब वे दो कैसे-

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन रहत सदा तोहिं पाहीं।
जानु प्रीति रस एतनेहिं माहीं।।
हमरे नित्य किशोर अजन्मा।विहरत प्रान  एक तन द्वै मा।
मन एक तन दो हैं।यही मन का एक होना ही तो अपने श्रीसीताराम का शब्दार्थ शरीर युगल लीला का एकत्व है।
लिंगपुराण में व्यासवाणी है-
अर्थः शम्भुः शिवा वाणी।
वस्तुतः भगवान् अर्थ हैं और भगवती शब्द हैं। हर एक शब्द का अर्थ होता है और हर एक अर्थ का शब्द भी।
शब्दरूप विदेहतनया जब देह में आती हैं, तब उन्हीं से उनके अभिन्न अर्थरूप श्रीराम को जान पाते हैं। यह शब्दरूपा अमिता अनन्ता असीमा मैथिली इन्ही अमित अनन्त असीम अर्थ रामजी  को समझने का साधन हैं।
अर्थ साध्य है, और शब्द साधन हैं। युगल रूप में दोनों ही साधन भी हैं और साध्य भी।नारायण, तुलसीप्रसाद रूप श्रीमद् रामचरितमानस में यह भाव शब्दार्थ नित्य सम्बन्ध रूप में प्रवाहित है।जैस जल और उसकीं लहरें परस्पर एक होकर विभिन्न अलग अलग दीख जाती हैं, लेकिन होती तो एक ही हैं। उसी तरह हमारी विन्ध्याद्रिवासिनी  विन्ध्यवासिनी वैदेही, गिरा अर्थात् वाणी या शब्द हैं और हमारे रामजी अर्थ हैं।
हाँ, देखने में पृथक् लेकिन अनुभव में एकरूप ऐसे श्रीसीतारामयुगल के चरणों में अनुरक्ति तो इन्ही शब्द रूप आचार्या की कृपासाधन से साध्य है।अब प्रश्न यह कि संसार से यह जीव, खिन्न तो पहले  हो,जिसकी खिन्नता देख कर सन्त सद्गुरु भगवान् इसे दुस्तर माया के पार ले जाकर, श्रीरामानुराग दें। लेकिन यह भी देखने की बात है कि इनके प्रति  अनुराग देने वाले सन्त सद्गुरु बिरले हैं, जो इन्हीं की प्रकृति वाले अपार करुणा के गम्भीर समुद्र हैं। और ये ही इस जीव के अविद्या माया के विकट बन्ध को काट देते हैं। मन्त्रादि शब्द साधन देकर उन अपार पारावार अर्थ या परमार्थ की प्राप्ति करा देने में सर्वसमर्थ हैं।
नारद शुक सनकादि व्यास की सुदीर्घ परम्परा है, सद् गुरुओं की। चाहे श्रीमद् आद्य अनन्त श्रीसम्पन्न भगवान्  रामानन्दाचार्य हों अथवा तद् अनुग्रह लब्ध सूर कबीर तुलसी रैदास मीरा आदि,सभी तो उन्ही असीम की याचित/अयाचित कृपा की शब्दरूपी प्रसादी देकर कातर जीव को भवपार कराने की नौका ही प्रदान कर दिए हैं।
और कहिये कि इन्ही तुलसी जैसे तद्भक्तों की श्रीरामजी पर चढ़ी  तुलसीप्रसादी ही तो है, जो विनय की अगाध गहराई में ले जाकर अस्थिर जीव के जन्मकर्म जाल को सदा सदा के लिए ध्वस्त करके उसे स्थिर कर देती है।
अकारण करुणा वरुणालय सन्त सद्गुरू जो तद् भाव के आग्रही हैं, निष्काम हैं, प्रेमरस की वारुणी में मस्त रहनेवाले हैं,  कृपा करैं और दीनों पर द्रवित होकर कृपा बरसानेवारी बरसानेवारी पराम्बा  विन्ध्यनगविहारिणी की असीम करुणा   कृपारूपानन्तानन्द की मदिरा में सदैव ही  जीव डूबा रहे ,इनका इनकी  मस्ती ही चढ़ी रहै,जिससे भव की बस्ती का बसना दास का सदा के लिये छूट ही जाय।
कहाँ से कहाँ बहता हुआ आया कुछ भी  पता नहीं। जाने जानता जान सकता है, वही,जिसे सब जानता नहीं।
अब क्या करूँ साहब मैं का मैं पना जाता नहीं। हे गुरु प्रभु ऐसी कृपा कर  कि जिससे जीव आता जाता नहीं।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
http://shishirchandrablog.in

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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