सेव्य प्रभु बरना 

भजन अरथ सेवा ही करना।
सेवक जीव सेव्य प्रभु बरना।।
बने दीन तब जीव समझना।
दीनानाथ द्रवत दुख  हरना।।
चर अरु अचर जगत में रहना।
सबको ब्रह्मभाव चित गहना।।
भज गोविन्दं अरथ समझना।
जग गोविन्दभाव में धरना।।
ब्रह्म सिवा जग में कोऊ ना।
सेवक बन सेवा ही करना।।
गीता का उपदेश  समझना।
भक्त अनन्तर भक्त धारना।।
भक्तों के जो भगत रहैना।
वही भक्त ढिंग श्रेष्ठ कहैना।।
हनूमान ज्यौं सेवक बनना।
सेव्य राम की सेवा करना।।
सेवक हनुमत सेवा धरना।
कर्मश्रेष्ठ सब कुछ कौ गहना।।
भजन शब्द का अर्थ समझना।
अर्थ ग्रहण कर सेवा करना।।
सेवा में सब वस्तु अरपना।
स्वयं सेव्य के अर्पित रहना।।
भजन अरथ सेवा ही करना।
सेवक जीव सेव्य प्रभु बरना।।

  हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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