चर अरु अचर दृष्टि गिरिधर दे


शारदे वरदे,मन मेरा अपने में कर दे।चर अरु अचर दृष्टि गिरधर दे।जगतअविद्या माया हर दे।हर हर हर हर चरण निकर दे। कर दे भेद दूर दर दर दे।मातः यही अभय वर वरदे।हंस स्वरूप जीव तव आसन।
मम जिह्वा पर कुरु अनुशासन।झंकृत वीणा की सुरलहरी।बजे निरन्तर हरी हरी।जनम जनम का तमस हृदय। हो जाय करुणया सार्द्र सदय। जीवन जीव कर्म नद तर दे।सदा दास को अपना कर दे।शारदे वरदे,मन मेरा अपने में कर दे।चर अरु अचर दृष्टि गिरिधर दे।विन्ध्य गुहा गिरि शिखर राजती।तारे तुम  क्या जोगि जती।तव उन्मुख सबको तूँ वर वरदे। अब तो देवि अमर कर दे।
शारदे वरदे,मन मेरा अपने में कर दे।
चर अरु अचर दृष्टि गिरिधर दे।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्


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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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