भक्ति में चाहिए,नहीं,जैसा आप चाहें,यही भक्ति है।भावग्राही जनार्दनः।
भोजन ग्रहण से पूर्व,भगवान् को भोग लगाकर तत् प्रसाद को प्रसाद भाव से लेना सामान्य है।लेकिन इन्हे खट्टे बेर न मिल जायें,इसलिये स्वयं रसना पर परख कर स्वयं सेवित जूठे बेर खिलाना,अत्यंत भावपूर्ण और असाधारण है।
इसीलिये, न काष्ठे विद्यते देवः।न पाषाणे न हिरण्मये।भावे हि विद्यते देवः तस्माद् भावावलम्बनम्। भगवान्, काष्ठ,पत्थर और सोने की मूर्ति में,नहीं हैं।भगवान् की यह मूर्ति उनका अर्चावतार है। हम भाव से अर्चा/पूजा करें,साक्षात् भगवान् ही मानकर,यही श्रेयस्कर प्रेयस्कर दोनों है।इसी भाव पूजन से लोकालोक सब मिलेगा। हमें क्या चाहिए, यह हम क्या जानें अल्पज्ञ जीव।यह तो वही सम्यक् जान सकते हैं, जिनके बनाये हम सहित सारा संसार है।इसीलिये भगवत् पूजा तो कामना पूर्वक नहीं करना चाहिए, बल्कि निष्काम भाव से। भाव का भावार्थ है-
भवनं भावः वस्तुतः।
जो होता है, हो रहा है, हुआ है, अथवा होगा,वह सभी भाव है। भगवान् का ही सब कुछ है, लेकिन हम केवल और केवल भगवान् के ही हैं,यह बाद में आने वाला भाव है।
अतः यह अनु माने पश्चाद् भाव है,बाद में होता है, इसीलिये भाव के बाद अनुभाव है।अनुभाव इसलिये कहा जाता है, कि यह अनुभाव,भाव ही वास्तविक अनुभव कराता है। अनुभाव तो वाल्मीकि अवतार पूज्यपाद तुलसीदास का तुलसीप्रसाद श्रीरामचरितमानस है।क्योंकि कोई भी हो,यह तुलसीप्रसाद राचरितमानस हमारे जैसे कलिमलग्रस्त जीवों हेतु परम हितकर है।नहीं तो सभी व्यास मञ्चों से,जाने अनजाने कैसे चढ़कर प्रसाद रूप,मिलता। तुलसीग्रहण से प्रसन्न हो जाने वाले हमारे ठाकुर जी को भाव पूर्वक यही तो चाहिए, नहीं तो माया उनकी और हम का अहम् देखिये कि, इसे अपना मानकर सोना चाँदी रूपया पैसा अन्न वस्त्र सब चढ़ाये जा रहे हैं,हम माया के स्वामी मायापति कदापि नहीं हैं।
हाँ,मायापति हमारे हैं।वे शरण्य,हम उनके शरण्य। वे भोक्ता,हम उनके भोग्य।जहाँ भेजो वहाँ जायेंगे।तुम्हारी चाहत,मेरी राहत।यही आत्मनिक्षेप और कार्पण्य ही शुद्धा प्रेमा प्रपत्ति भक्ति ही,भक्ति है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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