राम जनम के हेतु अनेका परम विचित्र एक ते एका

भगवान् श्रीराम के अवतार के सम्बन्ध मे प्रश्न करने पर भगवान् शिव द्वारा भगवती उमा को उपर्युक्त उत्तर दिया गया था। शिवजी द्वारा “इदमित्थं कहि जाइ न सोई” कहकर पहले यह भी सचेत किया गया कि यह कही जाने वाली कथा इतनी और ऐसी ही है, यह नहीं कहा जा सकता क्यों कि नाना कल्पों के भेद से श्री भगवान् की अनेकानेक कथाएँ हैं, जिन्हें मुनियों ने वर्णित किया है। इसलिए समग्र कथन को ध्यान पूर्वक सुनकर धारण करना चाहिए। उन्होंने कहा-
सुनहु राम अवतार चरित परम सुन्दर अनघ । कहहुँ उमा सादर सुनहु।

श्री भगवान्‌ का अवतार वस्तुतः धर्मरक्षा और भक्तों को आनन्द प्रदान करने के लिये होता है – जब जब होइ धरम कै हानी बाढहि असुर अधम अभिमानी। तब तब प्रभु धरि मनुज शरीरा हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा । देखिये, अनन्त ब्रह्माण्ड तो भगवान् की लीला विलास से उत्पन्न है। सृष्टि का तिनका तिनका ब्रह्मरूप ही है- सर्वम् इदं खलु ब्रह्म । भगवान् हमारे अंशी है और सभी चर अचर जीवमात्र उनके अंश । इसमें भी मानव शरीर को देवताओं के लिये भी  दुर्लभ और कर्मजन्ममृत्यु के बन्धन से मुक्त होने वाला कहा गया है। हम अपने अंशी भगवान् के गुणों को आत्मसात् करके नर से नारायण हो जायें, यही मनुष्य जन्म और श्री भगवान् के द्वारा नर देह धारण कर अपने चरित्र से सभी के शिक्षा देने का अभिप्राय हेतु है। इसीलिये उमाशंकर ने भगवती उमा से भगवान् के अवतार प्रसंग में – असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु । जग विस्तारहिं विसद जस राम जनम कर हेतु, ऐसा कहा। शिवजी ने आगे कहा-

जय विजय नामक दो द्वारपाल बैकुण्ठाधिपति के अन्तिम सातवें द्वार पर नियुक्त थे। एक बार सनक सनातन सनन्दन और सनत कुमार नाम के परस्पर भ्राता ऋषिगण, जो कि भगवान् की त्रिगुणमयी माया से विमुक्त होकर दिगम्बर नंगे ही विचरते थे, उन द्वार रक्षकों द्वारा भगवान से मिलने से रोक दिए गए :-
जय अरु विजय जान सब कोऊ । द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। 

रोके जाने से निर्बाध विचरणशील सनकादिकों ने इन रक्षकों को तीन जन्म तक राक्षस योनि प्राप्त होने का शाप दे दिया। सर्वज्ञ लक्ष्मीनारायण घटना जानकर द्वार पर आ पहुँचे और अपने भक्त रक्षकों के हित, चार अवतार ग्रहण करने का संकल्प कर लिया।
पहले जन्म में जय-विजय कनक काशिपु अरु हाटक लोचन (हिरण्यकशिपु हिरण्याक्ष) हुए, जिन्हें श्रीभगवान् ने वराह और नरसिंह अवतारों में मारा था – धरि वराह वपु एक निपाता । होइ नरहरि दूसर पुनि मारा।

द्वितीय बार – मुकुत न भए हते भगवाना क्योंकि तीन जनम द्विज वचन प्रमाना। अन्य जन्म में यही जय-विजय – भए निशाचर जाइ तेहि कुम्भकरन रावन सुभट। भगवान् ने इन्हें एक कल्प में श्री रामावतार ग्रहण कर मारा। द्वापर युग में यही जय-विजय शिशुपाल दन्तवक्त्र होकर जन्मते हैं, जिन्हें भगवान् श्रीकृष्णावतार लेकर विनष्ट करते हैं। इस प्रकार वैकुण्ठाधीश के पार्षद रूप में जयविजयार्थ अवतार की एक कल्पान्त कथा यहाँ पूर्ण होती है। एक कलप एहि बिधि अवतारा चरित पवित्र किए संसारा ।

शाप आदि द्वारा भी श्री राम के जन्मने का प्रसंग भगवान शिव सुनाते हैं। अपर कल्प में श्रीराम जन्म की कथा में कश्यप अदिति तहाँ पितु माता ये दशरथ कौशल्या पिता-माता होते हैं। जब परम सती वृन्दा के सतीत्व से राक्षसी वृति वाले जालन्धर का विनाश नहीं हो रहा था, तब भगवान – एक कलप एहि विधि अवतारा चरित पवित्र किए संसारा। जालन्धर के अत्याचार से धरती दुःखी होती है और भगवान् शिव भी स्वयं इन्द्र के साथ युद्ध कर के जालन्धर को नहीं मार पाते हैं – परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जिता पुरारी

श्री भगवान् अपने भक्तों का उद्धार करने हेतु छलकर के जालन्धर रूप में सती वृन्दा के पास आकर उनके अंगो का स्पर्शमात्र कर लेते हैं। इतने मात्र से सती वृन्दा का सतीत्व नष्ट हो जाता है और भगवान् शिव जालन्धर का वध कर देते हैं। वृन्दा को पतिवध सुनकर क्रोध होता है और वह भगवान् को ही पत्थर होने का शाप दे देती है। इसीलिए भगवान शालग्राम शिला रूप में आज भी पूजे जा रहे हैं तथा वृन्दा जो तुलसी पत्र रूप में भगवान् की प्रिय हो गई- अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय। शिव जी द्वारा वध होने पर भी जालन्धर मुक्त नहीं हो पाया। वह इस कल्प में रावण रूप में जन्मता है। जिसका एक कल्प की श्रीरामावतार कथा में भगवान् वध करते हैं – तहाँ जलन्धर रावन भयऊ । रन हति राम परम पद लयऊ। एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नर देहा। 

एक अन्य कल्प में भगवान् की लीला और शापानुग्रह का प्रसंग देवर्षि नारद के क्रोध से जुड़ा हुआ है, जब भगवान् नारद जी के शाप को सादर स्वीकार करके श्रीराम के रूप में जन्म ग्रहण करते हैं- नारद शाप दीन एक बारा। कलप एक लगि तेहि अवतारा। कथा इस प्रकार है – एक बार देवर्षि नारद हिमशैल पर तपश्चरण में लीन थे, जहाँ – भयउ रमापति पद अनुरागा की दशा मे सहज विमल मन समाधिस्थ हो जाता है। मुनि को देख कर इन्द्र को भय हुआ कि ऐसे तो नारद जी इन्द्रलोक पर अधिकार कर लेंगे :- मुनि गति देखि सुरेश डेराना । चहत देव रिषि मम पुर बासा । अब इन्द्र ने काम को देवर्षि का तप भंग करने हेतु भेजा लेकिन नारद ने काम को परास्त कर भगा दिया। इसके बाद नारद जी शिव के पास आते हैं और कामविजयी होने का समाचार देते हैं- तब नारद गवने शिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं। यही नारद जी का अहंकार उनको भगवान् की त्रिगुणा माया के अधीन कर देता है। भगवान् ने परम प्रिय नारद के अभिमान अवगुण का नाश करने हेतु एक लीला संसार की रचना की, जो वैकुण्ठ से भी अधिक रमणीय था। वह नगर विश्वमोहिनी नामक राजकुमारी का था जिसमें उसने अपना विवाह करने हेतु स्वयंवर आयोजित किया था। नारद जी भगवान् के पास पुनः आकर सुन्दरतम रूप माँगते हैं, जिससे वह राजकु‌मारी उन्हे वरण कर सके। श्री भगवान् को तो प्रियतम नारद का अहंकार नष्ट करना था, अतः उन्होंने उन्हें वानर रूप प्रदान कर दिया। अपना रूप सुन्दरतम जानकर नारद जी स्वयंवर में जाते हैं। राजकुमारी उन्हें नहीं वरण करती। सभा मध्य श्रीशिवजी के गण भी विप्र रूप में बैठे होते हैं। ये दोनों नारद के वानर रूप पह हँस देते हैं और एक दर्पण में उनका वानर रूप दिखा देते हैं। इसी के बाद नारद जी का पूर्व का मुनि रूप प्रकट हो जाता है। किन्तु हरेिलीला वश उन्होने दोनों रुद्रगणों  को राक्षस होने का शाप दे ही दिया, यही दोनों रावण कुम्भकरण के रूप में पैदा हुए – होइ निसाचर जाइ दोउ, कपटी पापी दोउ । 

वहाँ से क्रोधवशीभूत नारदजी श्री भगवान् को भी शाप देने हेतु उद्यत होते हैं। रास्ते में वो उसी स्वयंवर वाली राजकुमारी को श्री भगवान् के साथ देख लेते हैं। क्रोधाविष्ट होकर, नारी-विरह और बानर रूप धारी सेवकों की सहायता का शाप दे देते हैं – करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी। मम अपकार कीन तुम भारी। नारि बिरह तुम होब दुखारी। तब भगवान् अपनी त्रिगुणा माया को खींच लेते हैं और नारद का अज्ञान अहंकार नष्ट हो जाता है। नारद जी बार बार क्षमा मांगते हैं, परन्तु श्री भगवान् उनके शाप को स्वयं का ही लीलाशाप अनुग्रह मान कर सिर पर धारण कर लेते हैं- शाप शीश धरि हरषि हिय प्रभु बहु विनती कीन्ह। यह नारद शाप भी रामावतार का एक कल्प में हेतु बनता है, जिसमें रावण रूप धरे हरगण में से एक के द्वारा सीताहरण होने पर भगवान् उनका समूल वध कर देते हैं। एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार । सुर रंजन सज्जन सुखद हरिभंजन भुवि भार। करोड़ो कल्पों में भी श्रीराम अवतार प्रसंग को पूरा पूरा नहीं कहा जा सकता।
  भगवान् शिव ने कहा – रामचंद्र के चरित सुहाए, कलप कोटि लगि जाहिं न गाए। अब भगवान् शिव ने अन्य कल्प की श्रीरामावतार कथा प्रारंभ की – कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नाना विधि करहीं। इस कल्प में मनु शतरूपा की तपस्या के बल से दशरथ कौशल्या के गृह में भगवान् अयोध्या में जन्मते हैं- अपर हेतु सुनु शैलकुमारी। कहहुँ विचित्र कथा विस्तारी। जेहि कारन अज अगुन अरुपा । ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा। लगे बहुरि बरनै वृषकेतू  (शिवजी) सो अवतार भयउ जेहिं हेतू
       स्वायंभुव मनु अरु सतरू‌पा, जिन्ह ते भइ नरसृष्टि अनूपा। इन्ही से उत्तानपाद और हरिभक्त ध्रुव का जन्म होता है। आगे मनुशतरूपा नैमिषारण्य तीर्थ में जाकर घोर उग्र तप करते हैं, जिसमें छः हजार वर्ष जलाहार करते हैं और सात हजार वर्ष तक वायु आहार पर रहते हैं – एहि विधि बरस षट सहस बारि अहार। संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार। (दोहा – 144 बालकाण्ड)। अब इन दोनों ने जल और वायु आहार भी छोड़कर दस हजार वर्ष तक खड़े होकर तप किया । ब्रह्‌मा विष्णु महेश बार बार आते हैं और वर माँगने को कहते हैं- बरस सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ । विधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहुबारामाँगहु बर बहुभाँति लोभाए । परम धीर नहीं चलहिं चलाए। अस्थि मात्र होइ रहे शरीरा। 

विवश होकर वैकुण्ठाधिपति ने मृतक को भी जिला देने वाली गम्भीर आकाशवाणी की और वर मांगने के लिए कहा- मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर लगि आई। वैकुण्ठाधिपति ने अपना सम्पूर्ण रूप प्रकट किया, वे भगवान् श्री सीताराम के रूप मे प्रत्यक्ष हो गए- भृकुटि विलास जासु जग होई । राम बाम दिसि सीता सोई। माँगहु वर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि । (बालकाण्ड दोहा 148 )

   तब मनुशतरूपा ने भगवान् के समान पुत्र पाने का वर माँगा – चाहहुँ तुमहि समान सुत प्रभु सन कौन दुराउ  (दोहा 149)। भगवान् ने अपने समान कोई अन्य नहीं होने की बात कहकर स्वयं मनुशतरूपा सहित अपर जन्म में दशरथ कौशल्या के गर्भ में श्रीरामावतार रूप से प्रकट होने की बात कही है- आप सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई। होइहहुँ अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत। (बालकाण्ड दोहा 151)

इस प्रकार श्री रामावतार का हेतु कहने के बाद शिवजी ने उमा से कहा कि भरद्वाज ऋषि को याज्ञवल्क्य ने एक और श्रीराम जन्म का हेतु का बताया है- यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही वृषकेतु । भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु (बालकाण्ड दोहा – 152)।
  आगे की कथा में राजा प्रतापभानु और उसके भ्राता अरिमर्दन की कथा का वर्णन है जिसमें आखेट के बहाने राजा विन्ध्याचल के घने गहरे काले वन में नाना मृगों का शिकार करते हुए रास्ता भूल जाता है- विन्ध्याचल गँभीर बन गयऊ । मृग पुनीत बहु मारत भयऊ। भटकते हुए वह कपट मुनि वेशी को देखता है- तहँ बस नृपति कपट मुनि बेषा । यह कपटमुनि इस राजा प्रतापभानु का पूर्व शत्रु है, जिसे पराजय मिली थी। इस कपट मुनि ने तो राजा को पहचान लिया किन्तु राजा उसे नहीं पहचान पाया।  इसने राजा को धरती का एकछत्र सम्राट होने का लोभ दिखाया। स्वयं प्रतापभानु के यहाँ जाकर विप्र ब्राह्मणों को भोजन वस्त्रादि से निरन्तर प्रसन्न करके एकछत्र राजत्व प्राप्त कराने की झूठी योजना में लग गया। जान बूझकर प्रतापभानु का काम बिगाड़ने और अपना शत्रुत्व निर्वाह करने में सफल हो गया, क्योंकि रसोईघर में जाकर नाना पशुओं और ब्राह्मण आदि के मांस को ब्राह्मणों को ही परोसवा दिया :- भयउ रसोई भूसुर मासू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू । भै अकास बानी तेहि काला । विप्र शाप किमि होइ असाँचा । सत्य केतु कुल कोउ नहिं बाँचा


समय पाकर यह प्रताप भानु ब्राह्मण शाप से सभी भाइयों सहित राक्षस हुआ जिसमें प्रताप भानु रावण बना और अरिमर्दन उसका भाई कुम्भकरण हुआ । उसका मन्त्री धर्मरुचि विभीषण बना – दस सिर ताहि बीस भुजदंडा । रावन नाम वीर बरि बंडा । भूप अनुज अरिमर्दन नामा भयौ सो कुम्भकरन बलधामा । सचिव जो रहा धर्मरुचि जासू। नाम विभीषन जेहिं जग जाना विष्णु भगत विज्ञान निधाना।
    इस जन्म मे तीनों भाइयों ने उग्र तप किया तब ब्रह्मा जी ने आकर वर दिया। वरदान में रावण ने वानर और नर (मनुष्य) शरीर के अलावा किसी के भी शरीर के द्वारा नहीं मारे जाने का वर पाया- हम काहू के मरहिं न मारे । वानर मनुज जाति दुइ मारे। (दोहा 376 बालकाण्ड)

  कुम्भकरण ने छः मास की निद्रा वररूप में पाई- माँगेसि नींद मास षट केरी। विभीवण को ब्रह्मा ने उसकी याचनानुसार भगवत् चरण अनुराग दे दिया – गये विभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र वर माँगु । तेहि माँगेसि भगवन्त पद कमल अमल अनुरागु। (बालकाण्ड दोहा 177)

   आगे की कथा में रावण के अत्याचार से धरती इन्द्रादिक देवगण सहित सभी त्रस्त हुए। सभा बुलाई गई और सभी लोग भगवान् शिव के नेतृत्व में श्री भगवान् के पास जाते हैं- तेहि समाज गिरिजा में रहेउँ, जय जय सुरनायक जन सुखदायक – इत्यादि वचनों से ब्रह्मा जी ने स्तुति की है। भगवान् ने बचन दिया कि सभी निर्भय हो जायें मैं श्रीरामावतार नररूप धारण कर रहा हूँ – जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहिं लागि धरिहौं नर वेसा ॥ इस प्रकार मनु शतरूपा अपर जन्म में कश्यप अदिति हुए है जो दशरथ कौशल्या होकर जन्मते हैं। इन्ही के घर अयोध्याधाम में वर्तमान श्री रामावतार सिद्ध होता है – कश्यप अदिति महा तप कीन्हा। तिनकहुँ मै पूरब वर दीन्हा। ते दशरथ कौशल्या रूपा। कौशलपुरी प्रकट नरभूपा। तिन्ह गृह अवतरिहहुँ मै जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई। नारद वचन सत्य सब करिहहुँ। परम शक्ति समेत अवतरिहहुँ। 

अब ब्रह्मा जी ने धरती सहित सभी को समझा बुझाकर वापस भेज दिया, जो गोरूप होकर श्री वैकुंठाधिपति के पास शिवजी नेतृत्व मे गए थे। ब्रह्मा जी भी ब्रह्म लोक सिधारे और सभी देवताओं को वानर रूप धारण करने का आदेश दिया। ये सभी भगवान के रामावतार मे सहायता करते हैं- तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जिय आवा। निज लोकहिं विरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ। बानर तन धरि धरि महि हरिपद सेवहु जाइ।  

  इसी स्थान पर भगवान के श्री रामावतार का हेतु प्रकरण कहकर शिवजी ने प्रसंग को पूर्ण किया – राम जनम के हेतु अनेका। परम विचित्र एक ते एका

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शिशिर चंद्र उपाध्याय
आचार्य, संस्कृत विभाग
के.बी कॉलेज, मीरजापुर

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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