निर्लोभता आयेगी,दीन भाव धारण करने में।दीनता,भक्ति महरानी का आसन है।दीन और अकिंचन भक्तों को भक्तमाल में देखना होगा।देने के भाव में,यदि यह समझ में आ जाये,कि सारी माया,तो मायापति की है। मेरा क्या है, तो कहाँ का लोभ मोह।
और यह भाव कि,मुझे जो भी मिला है, मैं उसके योग्य नहीं था। इग्नोर मत करें,भक्तचरित्रों को। भक्तचरित्रों का पठन ही दैन्य,उपजायेगा,बारम्बार।
भक्तचरित्रों के श्रोता,तो भगवान् हैं। भक्त का मतलब ही है, अब भगवान् ही चाहिए।बहुत बिगड़ा का नाना जन्मों से काम, दास का । विनयजी और भक्तमाल पढ़े बिना, और नहीं चाहिए मुझे अब सिवाय अपने अंशी के,यह भाव सतत रहे बिना,एक जीवन और व्यर्थ।
जिन भक्तों/गुरुओं की लोभ वृत्ति थी ही नहीं, उन्हीं का चरित्रानुसन्धान भक्तमाल का आश्रय लेकर अपनाना होगा।
अन्यथा, गोस्वामीजी की विनय चिठ्ठी, कोउ कछु देइ कहै भल,यह वासना न उर ते जाईं,एक पतन के लिये बढ़ा देगा। जैसे घूरे पर फेंकी वस्तु का अपना स्वत्व नहीं, हमारे द्वारा प्रयुज्यमान हमारी रूमाल,हम हाथ पोंछें,सर पर धरें,कमर में बाँधें उसे कोई गिला शिकवा नहीं, वैसे अपने को समर्पित भाव की दृढता में पगना होगा।
न हँस के सीखें हैं, ना रोके सीखें हैं।जो कुछ भी सीखें हैं, किसी के होके सीखें हैं।
शरणागति भाव दास भाव है।सन्तोष हो जाय,धन मान से,और असन्तोष हो जाय, दासभाव से या यों कहें कि मेरी साधक भी नहीं बन पाया। साधक क्या मनुष्य भी नहीं, वेद कहते हैं, मनुर्भव।यह मनुष्यता ही आयेगी तभी जब नाना जन्मों की अकड़न जकड़न के अतीत बैठे अमानी,निर्लोभी चरित्रों का चरित्रानुसन्धान होगा।
सद्गुरु बैद बचन बिस्वासा,
वाले सद्गुरु की चरण शरण ग्रहण ही लोभः पापस्य कारणम्, से हटाकर निर्लोभ आकारवृत्ति देने में क्षम है।अतः बात एक ही है, किसी सद्गुरु को,सब कुछ सौंपो।और निर्लोभी,अपरिग्रही,के बिना, संग्रहपरिग्रहभाव जायेगा ही नहीं। बात फिर से वही- न हँस के सीखा है, ना रोके सीखा है।जो कुछ भी सीखा है, किसी के होके सीखा है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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