दिव् क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुति- स्वप्नमोदमदकान्तिगतिषु।
इस प्रकार दिव् धातु के दस अर्थ भगवान् पाणिनि ने किये हैं :
1- मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य अपनी आत्मा में परमात्म दर्शन कर उसमें रमण क्रीडा करना ही है।
2-विजिगीषा का अर्थ विजय की इच्छा है। यह मनुष्य जीव, कामादि विचारों पर विजय अभिलाषा,रखते हुए उसमें नाम जपादि साधनों से प्रवृत्त होकर,जीवन को कृतार्थ कर ले।
3- व्यवहार ऐसा हो,जिससे अपने अंशी परमात्मा के करुणा,कृपा,सौशील्य आदि
गुण संचरित होकर स्व का पर से भेद ही मिटकर ,अभेद दर्शन करा हो जाय।और यही तो परम प्रयोजन है।
4- द्युति प्रकाशार्थक है।आत्मा भी प्रकाश रूप है,इसकी पहचान ही,भक्ति है।
5- स्तुति, मनुष्य जीवन का अभिन्न मार्ग है, जिससे लौकिक, अलौकिक सभी पद पदार्थ प्राप्य हैं।
6-स्वप्न से तात्पर्य, नाम जपादि साधनों द्वारा,ईश्वर का सगुण रूप सर्व प्रथम स्वप्न में देख लेना है।
7- मोद, हृदय की प्रसन्नता का स्वसिद्ध
स्वरूप है, क्योंकि भगवान् जो विराजे हैं,वह मोदप्रमोद ही हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में,इस आत्मा का आत्मा इस मोद को ही कहा गया है।
8- मद, परम काम की स्थिति है, जिसका अनुभव भक्त ही करै,जानिये।
9- कान्ति, का अर्थ प्रकाश और चमक है, जिसको शरीस्थ चेतन ज्ञानस्वरूप के रूप में सारे व्यवहार का प्रवर्तक मानिये।
क्योंकि वह कान्तिमान् परमात्मा या आत्मा,न हो तो कौन सा शरीर कान्तिमान् रह सकता है। और कहिये कि शरीर पिण्ड के समस्त स्वयं या परस्पर व्यवहार उसी हरिः ओ3म् तत् सत् कान्ति से हैं।
10-गति का अर्थ जाना, प्राप्त करना और
ज्ञान भी है। वह आत्मरूप परमात्म तत्व
की ओर आत्मा से जाना,उसकी प्राप्ति और ज्ञान ही मानव जन्म का उद्देश्य है।
इस तरह यह दिव्य शब्द,दशार्थक है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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