राम राम जिह्वा रटि लागी।
माया छोड़ि कहाँ गै भागी।।
जिह्वा कौशल्या करि बूझो।
रामजनम प्रतिपल हीं सूझो।
मिटी अविद्या माया जानो।
विद्या रूप ऊजागर मानो।।
संसृतिचक्र चक्र- कर्तित।
स्वस्वरूपगत मन हर्षित।।
वही दिखाये दुर्लभ रस्ता।
जो उसमें सन्तत अलमस्ता।।
गुरु भगवत् कहता संसार।
देता वह षड् रिपु को जार।।
दुर्जय मोह अविद्या माया।
फँसी देह आकर्षी भाया।।
वह विद्या जो भेद मिटाती।
गुरु वत्सलता सबहिं दिलाती।।
हरिगुरुसन्तः चरणप्रपन्न।
जीव जगत माया आसन्न।।
गुरु भगवान् कृपामय अन्न।
लेत प्रसादी हुआ प्रसन्न।।
हरिः शरणम्।