हरिशरण न एकौ बाधा

मनुष्य का शरीर मिल गया और यह मन, श्रीसीताराम के अमितसौन्दर्यपूर्ण छवि के अनुसन्धान में नहीं जा पाया,तो समझो कि, एक जीवन पुनः पतन की ओर अग्रसर।
सुन्दरता कहुँ सुन्दर करई।
छविगृह दीपशिखा जनु बरई।।सब उपमा कवि रहे जुठारी।केहिं पटतरौं विदेहकुमारी।
जिन भगवती का सौन्दर्य, सुन्दर को भी सुन्दर बना दे और जो प्रकाशित भवन को भी सप्रकाश कर दे,उस रूप को कोई अनन्यचरणानुरागी ही देख पायेगा। सारी उपमाओं को जिन कविजनों ने प्रयोग कर जूँठाकर दिया है, ऐसी भूमिजा जानकी के रूप की उपमा इस अनन्त अनन्तब्रह्माण्ड में प्राप्त ही नहीं। अतः गुरुकृपावलम्बित भक्त नाम बल से युगललीला में प्रवेश पा सकता है।
ऐसे भक्त की मनोदशा ही ऐसी हो सकती है,जब वह अचाह हो जाये।और कह उठे-

हे नाथ आप अपने को ही दे दीजिए।अब कछु नाथ न चाहिअ मोरे।दीनदयाल अनुग्रह तोरे। क्योंकि,संसारेच्छा तो संसार में आनेजाने को ही दृढतर करती है।इस संसार के वासनाप्रवाह से एकहरिनाम ही मुक्त कर सकता है।
युगलसरकार के अवतार इसी कलिकाल में,बंगधरती को पवित्र करने वाले महाप्रभु चैतन्यदेव ने इसीलिये हरिनाम कीर्तन जप,स्मरण को एकमेवाश्रय माना और उस अवतार काल में नामशक्तिद्वारा जीव के पतनप्रवाह पर सदा सर्वदा के लिये रोक ही लगा दी।
उन्होंने कहा कि,वस्तुतः भगवान् ने अपने नाना नाम प्रकट किये और उन नामों में प्रायः अपनी सारी शक्ति ही भर दी। ऐसे हरिनाम का स्मरण देश काल और शुद्धाशुद्धि से परे है, जिसकी सतत
अविस्मृत स्मृति भगवान् और उनके रचे संसार तथा स्वयं भगवान् को भी दे देने में समर्थ है।
नामन्यकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः तत्रार्पिता,नियमितः स्मरणे न कालः।
-शिक्षाष्टक
गोस्वामीजी ने हम जैसे मलिन जीवों पर दया ही दिखाते हुए कामना इच्छाहीन बनने और भगवच्चरणाश्रय पाने का यही मार्ग बताया-
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा।थल विहीन तरु कबहुँ कि जामा।।
भगवान् तो करुणामूर्ति हैं, जो हमारी मलिनवासना नष्ट कर,वैकुण्ठ ही दे देते हैं, जहाँ श्रीभागवतजी प्रमाण हैं –

अहो बकीयं स्तनकालकूटं जिघांसया अपाययद् अपि असाध्वी।लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोन्यं कं वा दयालुं शरणं प्रपद्ये।।3/2/23 भागवत
जिस असाध्वी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर,बालश्रीकृष्ण को मारने की इच्छा से,दूध पिलाया,उन श्रीभगवान् ने उसे माता के अनुरूप गति देकर कृतार्थ कर दिया। अतः अब बताओ ऐसे दयाशील प्रभु को, छोड़ किसकी शरण ग्रहण श्रेयस्कर है।
इसलिये हम जैसे मलिन चित्त के जीव, ऐसे प्रभु रामकृष्णनारायण के नामों का आश्रय लेकर कृतार्थ हो जायँ।क्योंकि, नाम ही श्रेयस्कर है,इस प्रपंच बाध के लिए।नाम का आश्रय नामी का आश्रय होने से सदानन्ददाता है।तभी गोस्वामी जी ने उद्धोष किया-
सुखी मीन जहँ नीर अगाधा।
जिमि हरिशरण न एकौ बाधा।।

श्रीगुरुहरिसन्तः शरणम्।
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दशार्थक दिव्य

दिव् क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुति- स्वप्नमोदमदकान्तिगतिषु।

इस प्रकार दिव् धातु के दस अर्थ भगवान् पाणिनि ने किये हैं :
1- मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य अपनी आत्मा में परमात्म दर्शन कर उसमें रमण क्रीडा करना ही है।
2-विजिगीषा का अर्थ विजय की इच्छा है। यह मनुष्य जीव, कामादि विचारों पर विजय अभिलाषा,रखते हुए उसमें नाम जपादि साधनों से प्रवृत्त होकर,जीवन को कृतार्थ कर ले।
3- व्यवहार ऐसा हो,जिससे अपने अंशी परमात्मा के करुणा,कृपा,सौशील्य आदि
गुण संचरित होकर स्व का पर से भेद ही मिटकर ,अभेद दर्शन करा हो जाय।और यही तो परम प्रयोजन है।
4- द्युति प्रकाशार्थक है।आत्मा भी प्रकाश रूप है,इसकी पहचान ही,भक्ति है।
5- स्तुति, मनुष्य जीवन का अभिन्न मार्ग है, जिससे लौकिक, अलौकिक सभी पद पदार्थ प्राप्य हैं।
6-स्वप्न से तात्पर्य, नाम जपादि साधनों द्वारा,ईश्वर का सगुण रूप सर्व प्रथम स्वप्न में देख लेना है।
7- मोद, हृदय की प्रसन्नता का स्वसिद्ध
स्वरूप है, क्योंकि भगवान् जो विराजे हैं,वह मोदप्रमोद ही हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में,इस आत्मा का आत्मा इस मोद को ही कहा गया है।
8- मद, परम काम की स्थिति है, जिसका अनुभव भक्त ही करै,जानिये।
9- कान्ति, का अर्थ प्रकाश और चमक है, जिसको शरीस्थ चेतन ज्ञानस्वरूप के रूप में सारे व्यवहार का प्रवर्तक मानिये।
क्योंकि वह कान्तिमान् परमात्मा या आत्मा,न हो तो कौन सा शरीर कान्तिमान् रह सकता है। और कहिये कि शरीर पिण्ड के समस्त स्वयं या परस्पर व्यवहार उसी हरिः ओ3म् तत् सत् कान्ति से हैं।
10-गति का अर्थ जाना, प्राप्त करना और
ज्ञान भी है। वह आत्मरूप परमात्म तत्व
की ओर आत्मा से जाना,उसकी प्राप्ति और ज्ञान ही मानव जन्म का उद्देश्य है।

इस तरह यह दिव्य शब्द,दशार्थक है।

हरिगुरुसन्तः शरणम्

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लेत प्रसादी हुआ प्रसन्न

राम राम जिह्वा रटि लागी।
माया छोड़ि कहाँ गै भागी।।
जिह्वा कौशल्या करि बूझो।
रामजनम प्रतिपल हीं सूझो।

मिटी अविद्या माया जानो।
विद्या रूप ऊजागर मानो।।
संसृतिचक्र चक्र- कर्तित।
स्वस्वरूपगत मन हर्षित।।

वही दिखाये दुर्लभ रस्ता।
जो उसमें सन्तत अलमस्ता।।
गुरु भगवत् कहता संसार।
देता वह षड् रिपु को जार।।

दुर्जय मोह अविद्या माया।
फँसी देह आकर्षी भाया।।
वह विद्या जो भेद मिटाती।
गुरु वत्सलता सबहिं दिलाती।।

हरिगुरुसन्तः चरणप्रपन्न।
जीव जगत माया आसन्न।।
गुरु भगवान् कृपामय अन्न।
लेत प्रसादी हुआ प्रसन्न।।

हरिः शरणम्

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