दिव्य काल अब दृश्य श्रव्य।
हैं वीर शिवाजी दिव्य भव्य।
यह अतीत का काल मनोहर,
हर हर नगरी हर हर हर।।
देखो समझो जानो मानो,
दृढ निश्चय कर्म, उठो ठानो।
काशी में मंचन शिवाचरण,
मानवविरोधिता के प्रति रण।
जब म्लेच्छत्रस्त भारतमाता,
प्रतिकूल वेद उनका नाता।।
तब वीर शिवा थे उदित हुए,
बर्बर आक्रान्ता गए मुए।।
इतिहास कहानी कहता है,
हिन्दू न दुष्टता सहता है।।
विक्रम संवत द्विसहस्र बीस।
दशमी कार्तिक गुरु शुक्ल शीष।।
जाणता राजा उद्दाम नाट्य,
सुन्दर अभिनय है यह अकाट्य।।
मीरजा पुरी वासी हर्षित,
शिववीरवीरता आकर्षित।।
आनन्दमग्न रसपूर प्रकट,
सब दृश्य श्रव्य आमोद निकट।।
इतिहास जानता कहता है,
क्या वीर अनाचर सहता है।।
वह अमर शिवा राजा प्रति पल,
हर हिन्दु हृदय कहता अविरल।।
काशी हिन्दू विद्या धरती,
जाणता राजा अभिनय करती।
अमर कथा यह वीर शिवा की,
है अतीत की अनुपम झाँकी।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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