मौनं सर्वार्थसाधनम्



सामान्य सी बात है, पोथी का पण्डित और पण्डिताः समदर्शिनः वाले पण्डित में बड़ा भेद है।
शास्त्र और सन्तों की मानें तो,उनके ही शब्दों में एक मायिक है तो दूसरा है पूर्ण अमायिक,गुणातीत।

काशी में शरीर धरे और शास्त्रभाषा को सरल साधुवाणी में कहने वाले,श्रीमद् जगद्गुरु आद्यरामानन्दाचार्य भगवान् के एक सच्छिष्य हुए महात्मा कबीरदासजी।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पण्डित भया न कोय,कहकर पण्डित की तो अपर परिभाषा ही गढ़ दी,आपश्री ने। बिरले महात्मा थे।देखिए तो-
उनके शब्द, कैसे त्रिगुणा माया से पार नहीं हो पाने का संकेत करते हैं-
माया मरी न मन मरा मरि मरि गया शरीर आशा तृष्णा ना मरी कहते दास कबीर।

अरे,नारायण ध्यान देने योग्य है,कि माया
की आवरण,विक् षेप शक्तियों को पढ़ने पढ़ाने से दुर्धर्ष माया का आवरण नहीं हटेगा। माया जल्दी हटती भी नहीं।
कबीर की ही मानें तो उन्होंने गुरुप्रदत्त श्रीराम जय राम जय जय राम नाम पकड़ कर विक्षिप्त मन और माया जीत ली थी।एक जगह वे कहते हैं-

रमैया की दुलहन ने लूटल बजार,
ब्रह्मा को लूटल शिव को भी लूटल।
लूटल सकल संसार।कबिरा बच गया साहिब कृपा से शबद डोर गहि उतरा पार।यह शबदडोर रामनाम ही है। अब देखिये-
परिवर्तन परिवर्धन पतन उत्थान सृष्टि का नियम है। मन जब संसार राग रागी होकर भ्रमणशील रहता है,टिकना रुकना सम्भव ही नहीं है।चलेगा चलायेगा घूमेगा और घुमायेगा।नाना शरीरों और योनियों भी में भटकायेगा। बारम्बार भवाटवी भ्रमण
की प्राप्ति रोक देना और इसी मानव शरीर से जन्ममृत्युबन्ध को रोक देना,तो अत्यंत सरल है।वह सरल है केवल नाम जप की निरन्तर आवृत्ति की ऊर्जा से,जो कि हृद्गतज्योति परारूप है।
समझ की बात है, इस मानवीय जीवन में
लोक और लोकान्तर पदार्थ की प्राप्ति के प्रयोजन की सिद्धि, श्रीराम जय राम जय जय राम से हुई है, हो रही और होगी।

नाम, हरिकृष्ण राम नारायण दुर्गा सीता राधा कोई भी हो, सभी शब्दरूप है।इसके चाररूप-परा,पश्यन्ती,मध्यमा और वैखरी होते हैं।आकाशमय शब्द वैखरी वाणी है, इन वैखरी आदि का क्रमशः विलय मध्यमा,पश्यन्ती और परा में होता है। जो वाणी का उत्स है, वह परा है। चलन गमन उच्छलन क्रमण का स्रोत यहीं से है। लेकिन वाह्य परिणति वैखरी में है। पश्यन्ती और मध्यमा स्मृति है,तो परा आत्मस्थ। लेकिन कैसे भी हो, वैखरी भी जरूरी है।सन्तों के वैखरीशब्दरूप श्रीराचरितमानस जैसे ग्रन्थ नहीं होते और,वेदादिशास्त्रवैखरीवाणी न होती तो साधन क्या था।जीव का परम कल्याण हो या संसार ही की रहनी सहनी हो,कौन मार्ग बताता।संसार व्यवहार कैसे होता।अतः शब्द साधन अनिवार्य है।
भैया,वैखरी के विना तो हम जैसे सामान्य कलिमलग्रस्त जीव कुछ समझ भी नहीं सकते।जीव के आत्मकल्याण का साधन वैखरीशब्द भगवन्नाम जपरूप है।
जप व्यक्तायां वाचि और जप मानसे च, दो अर्थों में व्यवहृत है।इस प्रकार जप का अर्थ पश्यन्ती मध्यमा रूप मानसिक और वैखरी रूप स्फुट शब्द भी है।
चाहे नाम सङ्कीर्तन हो या स्मृतिरूप मनन श्रवण स्मरणादि हो,पहुँचेगा उस अनन्त परम परात्पर या तत् शक्ति परमा परात्परा तक,यहीं विश्रान्ति है। क्योंकि इसी से निकल कर, इसी की लीला से यह जीव अलग हुआ था।तब यहाँ पहुंचे बिना पायो परम विश्राम,कहां सम्भव है। अतः
शब्द से ही संसार और असंसार के सारे अर्थ का अवगम है,योगी,ज्ञानी भक्त की बात अलग है।परम योगी भर्तृहरि ने कहा था कि सभी को यह जानना चाहिए कि,
शब्द ज्योतिस्वरुप वैखरी विभाग में आने पर ही अर्थ का अर्थात् प्रयोजन का प्रकाश करता है।परा तो इसका मूल है।वाणी का शब्द का परम रस इसी परा तक जाकर परम शान्त हो जाता है।यही अन्तिम स्थिति लाभ है।
जगत् का सारा भान तो वैखरीशब्दानुगम से ही होता है।यह वैखरी ही अन्दर प्रवेश करके,इस शरीर पिण्डस्थ परमात्मरस का बोध कराती है, ऋषि ने इसे अनुभूत करके परम रस कहा था,जो परम प्रेम और आनन्द की अवस्था है,इसे शब्दादि साधनों से पाने के लिए ही,यह देह है।श्रुति उक्ति प्रमाण है-
रसो वै सः। रसं हि अयं लब्ध्वा आनन्दी भवति- तैत्तिरीयोपनिषद्- 2/7/2
परम योगी भर्तृहरि ने भी यही कहा-
प्राप्तरूपविभागायाः यो वाचः परमो रसः।
यत्तत् पुण्यतमं ज्योतिः तस्य मार्गः अयमञ्जसः। न सोस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भाषते।
वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड- 12-24

यह संसार और उसके सरकते दरकते व्यवहार व्यापार, बिना शब्दोच्चारण के कैसे सम्भव है। इसके विना कोई कैसे ज्ञान करायेगा।वैखरीशब्द से ही तो सभी,संसारक्रियाकलाप होता है। यह शब्द अनादिब्रह्म है। आकाश इसे धारण करता है। वाक्यपदीय में ही मङ्गलाशासन करते हुए, महायोगी भर्तृहरि इसी मत की पुष्टि करते हैं-
अनादिनिधनं ब्रह्म,शब्दतत्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेर्थभावस्य प्रक्रिया जगतः यतः।।
ब्रह्मकाण्ड-1
शब्दोङ्कार से उद्भूत संसार है, ऐसा शास्त्र और सन्त कहते हैं।
यह जीव जगत् अन्धकारमय ही तो रहता,यदि शब्दमयी ज्योति का स्फुरण शक्तिपात नहीं होता।महाकवि दण्डी ने भी इसी का समर्थन किया –
इदमन्धन्तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयं यदि शब्दाह्वयं ज्योतिः आसंसारं न दीप्यते।
काव्यादर्श-दण्डी -1/4
यह शब्द, अग्निप्रधान ज्योति स्वरूप है। यह शब्दज्योति परा रूप में सुषुप्त है।जब किसी अर्थ या प्रयोजन की प्राप्ति करनी होती है, तब सबका मूल अन्तः इन्द्रिय मन, विचलित होता है।और शरीर में विद्यमान अग्नि पर इसी मन का प्रहार होता है। ततः अग्नि, वायु को प्रेरित कर भेजता है,जो वायु आकाश में बिखर कर वैखरीशब्द बनता है। सृष्टि के क्रम में यह वायु ही अग्नि के पिता हैं।यह वायुदेव हृद्देश के मार्ग से चलकर,कण्ठगत होते हुए, मुखविवर से अपने पिताजी, आकाश जी में बिखर जाते हैं।यही है, वाणी का शब्द का अन्तिम चरम सोपान परिणाम, जिसे कहकर,सुनकर हम सभी अपने पराये अपराये सभी अर्थों को समझते बूझते हैं।
भगवान् पाणिनि ने अपने शिक् षा ग्रन्थ में इसका प्रकाश किया है,कि कैसे शाब्दी वाणी निकलती है-
आत्मा बुद्ध्या समेति अर्थान्,मनो युङ्ते विवक्षया।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्।मारुतः तु उरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम्। पाणिनीय शिक् षा- 2/6-7
आत्मा बुद्धि के साथ अर्थसिद्धि के लिये जब यत्न करता है, तब वह शरीरस्थ अग्नि पर प्रहार करता है। यह अग्नि, वायु को प्रेरित कर हृदय मार्ग से कण्ठमार्ग से,मुखद्वार से बाहर करके, वैखरी की सृष्टि कर देता है।
वैखरी वाणी रूप शब्द जैसे संसार का अर्थ सिद्ध करता है,वैसे ही असंसार का भी।अर्थानुसन्धान कभी भी, शब्दप्रयोग के बिना सम्भव नहीं है। इसलिए सर्वोच्च शरीर मानव का ग्रहण करके,अन्धेनैव नीयामानाः यथान्धाः की स्थिति न बने।इसका ध्यान करते हुए, प्रायः जब तक अनिवार्य न हो,न बोलने का अभ्यास और मन ही मन रामकृष्णनाराराण नामों के सतत मनन का अभ्यास ही कलिकाल में सारी उपलब्धियों का मूल है।
सुभाषितरत्नसमुच्चय में आई एक विचित्र परिहास परक गम्भीर बात सन्तों द्वारा कही सुनी जाती है-
मुख से निकलने वाणी को बन्ध मुक्ति कारक बताते हुए, पक्षी जैसी योनि का उदाहरण, दिया है। अपने मुख दोष से ही शुक और सारिकाएँ बन्धन में पड़ते हैं।बगुले नहीं बँधते,क्योंकि वे वस्तुतः अपने लक्ष्य शिकार पर ध्यान गड़ाए,मौन रह कर,लक्ष्य के समीप आ जाने पर झपट कर उसे पा लेते हैं।अतः मनुष्य को इसी वृत्ति से अपने इष्ट पर ध्यान गड़ा कर प्रायः मौन साधन करते हुए नाम जपादि अभ्यास में रहना चाहिए, जिससे जीवन लक्ष्य पाने में सरलता हो-
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः। बकाः तत्र न बध्यन्ते मौनं
सर्वार्थसाधनम्।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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