देव प्रतिष्ठित मन्दिर माहीं।
अन्तःकरण शुद्ध करि जाहीं।।
मन्दिर जाकर करै याचना
कहो मनुज वह साँच साँच ना
हरि कर कृपा जाहि पर होती।
सन्तगुरू मिलते तब मोती।।
मन अशुद्ध संसार परक है।
दीखे जगत जगत नरक है।।
बुद्धि मलिन कुविचार परी है।
हृदय माहिं अविवेक भरी है।।
चित्त चेतता जगत पदारथ।
कैसे क्यों सोचै परमारथ।।
हरिगुरुसन्त जिन जगत न रागा। ते सब भै हरिहर अनुरागा।।
अहं बुद्धि ममता नहिं छूटै।
क्या संसार वासना टूटै।।
अपने हृदय बसत संसारा।
कानन प्रविशे देखु अपारा।।
राम राम जपु प्रतिपल माहीं।
शुद्ध मनः बुधि चित्त तदा हीं।।
और न कलि यहिं साधन देखो। जप करि राम हरीहर लेखो।
कैसे हो अपरोक्ष आत्मगत।
स्वयं स्वतः है परम आत्मरत।।
सुख दुख सब है मनः भ्रमागत। मन कर शुद्धि राम नामागत।।
अतः जाहु गुरु सबद विचारौ।
शबद टेकि संसारहु टारौ।।
तुलसी सूर कबीर गहो पद।
तब वैराग्य भगै सारा मद।
संगासक्ति सबहिं विध त्यागो।
संगति साधु सदा अनुरागो।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्