नारायण नारायण नारायण कामलीलासक्त हम जैसे लोग जब, वेद देव सन्त समर्थ सद् गुरु चरणाश्रय ग्रहण करें तभी सन्मार्ग मिले।अत्यन्तवैराग्यवान् गुरुभगवान् ही कामादि हटायेंगे, जिनका कि हट चुका है। विषयविष बन्ध निर्मुक्तसाधु भक्त का पादाश्रय ही स्वर्गापवर्गासक्त भाव हटायेगा। जगत् का मान सम्मान पद पदार्थों की रुचि तो बारम्बार पार्थिव देहों में जीव को डालेगा ही।कालकर्म और ऐन्द्रिक ग्राहकों ने मुझे आजन्म घेर लिया है।जब मैं उनके हाथ बिकना,स्वीकार नहीं करता, तब वे मुझे बाँधकर,दाम दिखाते हैं।मतलब कि जैसे तैसे लालच दिखाकर अपने वश में करना चाहते हैं।कालकरमइन्द्रियविषय गाहकगन घेरो।हौं न कबूलत,बाँधि कै मोल करत करेरो – विनयपत्रिका पद 146
हे प्रभु जहाँ सत्संग कथा माधव की होती है, वहाँ मन जाता ही नहीं।लोभ मोहादि से मुझे प्रेम है।जहँ सतसंग कथा माधव की, सपनेहुँ करत न फेरो।लोभ मोह मद काम कोह रत,तिन्ह सों प्रेम घनेरो -वही पद -143
इसलिये हे नाथ साधुसद्गुरु संग देकर संसारद्वन्द्व भगाइये और अपनेचरणकमलों में ही राग दे दीजिये, तभी पार्थिव विकृति हटेगी और स्वस्वरूप की अवगति होगी,अन्यथा मैं संसार सागर में बारम्बार डूब ही जाता हूँ- सेवत साधु द्वैत भय भागै।श्रीरघुबीर चरन लय लागै।।देह जनित बिकार सब त्यागै।तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै।।
वही 136/11स्वप्न में भी द्वैतदर्शन में सुख नहीं है, सुखाभास छोड़कर।ब्रह्मविद् ब्राह्मण देवता गुरु हरि सन्तों के बिना संसार से पार पाना असम्भव है-सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत दरसन,बात कोटिक को कहै।द्विज देव गुरु हरि संत बिनु संसार पार न पाइये ।यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये-वही 136/12
अतः हम मायाधीन जीव।मायाधीश आप सिवासीव।हमें चाहे जैसा मान अपनाइये। विरागीसज्जन सद्गुरु संग पवाइये।
।हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।http://shishirchandrablog.in