नारायण नारायण नारायण अत्यन्त वैराग्य सम्पन्न महापुरुष का चरणाश्रय ही वैराग्य दे सकता है। यस्य निर्विषयं मनः और अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः जैसे वाक्य कथन में मानदण्ड हैं।विवेकवैराग्यख्यात जन ही वैराग्य बाँटते हैं, लेकिन किसी किसी सौभाग्यशाली को,गुरुहरि कृपा ही कारणता दीखती है, विषयविष के परित्याग में।ऐसे लोगों का जीवन धन्य धन्य है, जिन्हे हरिकथासंग प्राप्त हो।
क्योंकि हरिकथा इस कराल कलिकाल में मरणधर्मा मानव की अमरता है। तव कथामृतं तप्तजीवनम्।और वे धन्यातिधन्य हैं, जिन्हे पूज्य गोस्वामी जी जैसे सन्तों की वाणी में तृप्ति और आनन्दानुभूति होने लगे।ऐसे सन्तचरित्र और उनकी वाणी का प्रसाद, वर्तमान समय में तो, कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः इत्यादि व्यासवचन की सत्यता सिद्ध करते हैं।
भक्तसन्तों की उपस्थिति में यह स्वतः ही ध्रुव प्रमाण है।रमाविलासविलास राम अनुरागी तजत वमन इव नर बड़ भागी एवं गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं राम कृपा करि चितवा जाही जैसी वैराग्य विवेकसम्पन्नता हरिगुरुकृपा ही देती है। जिससे इस मायिक संसार में सुखाभासता की चरम प्रतीति होने लगती है। आपातरमणीय संसार के भोगों की निःसारता और सर्वकारणकारण भगवान् की सच्चिदानन्दमयता में सतत आत्मिक अनुभूति आने लगती है।
जब नेति नेति वह,,अपनी आत्मा में आनन्दनिर्झरझर्झर झरने लगा, तो चरम प्राप्य तो यही है।एक विशेष बात यह भी कि,मायिक उपाधियों से मुक्त परमपरमात्मा की अपरोक्षानुभूति मायोपाधि शून्यता दशा में ही अनुभवैक गम्य है। क्योंकि- आप मायाधीश मायाधीन जीव हम। करो निर्मल चित्त तुच्छ विषयविषसम।
हरिःशरणम्।। गुरुः शरणम्।।