पूछ लीजिए ज्ञान

रावण रजोगुण काम अहम् का दास था। राम विशुद्ध सत्व प्रजाकाम और कर्ता कारयिता होकर भी मर्यादा धर्म के विग्रह थे।

शंकर सहस विष्नु अज कोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।

ब्राह्मण वंशी होकर वेदज्ञ होकर भी यदि विद्या मद दम्भ दर्प और अतिमानिता है, तो समझो वह ब्राह्मण क्या, एक अदद मनुष्य भी नहीं।

अतः रावयति अर्थात् जन्म जन्मान्तर तक रोने धोने वाले संसार में ढकेलने वाले असद् भाव को धारण करनेवाला रावण है। वह प्रवृत्ति मार्ग से भगवत् प्राप्ति कामी था।प्रवृत्ति मार्ग से भगवत् प्राप्ति शास्त्र निषिद्ध है। श्रीराम दूत हनुमानजी महाराज जैसे ज्ञानिनाम् अग्रगण्यं की प्रथम अवहेलना ही,उसके पुनः पुनः वध की अवाध परम्परा सिद्ध करती है।

जो अपराध भगत कर करई। रामरोष पावक सों जरई।।

कोई जाति ब्राह्मण होने पर भी दानवता प्रतिमूर्ति होने पर ,बधार्ह ही है। और रही बात कुशासन मूर्तिमन्त लोभवन्त दुःशासन दुर्योधनों जैसों की,तो भगवान् ने द्रौपदी की करुणा से द्रवित होकर वस्त्रावतार ही ग्रहण कर लिया था।

यतः कृष्णः ततो जयः।

अधर्मी रावण भी और दुर्योधन भी। एक अभिमानमूर्ति और दूसरा राज्य लोभ मूर्ति।हमारी अपनी छोटी बुद्धि, अपनी सीमा में यही निर्णय कर पाती है कि, काम बड़ा अधर्म है और लोभ किंचित् छोटा अधर्म।काम का सन्यास यही कि, भगवत् काम हो जाय। और लोभ का सन्यास यही की भगवत् चरणारविन्द लोभी हो जाय।

हम जन्म जन्मान्तर की अपनी मलिन वासना से सही निर्णय पर नहीं पहुँच पाते।सुविचारित सुसंगत का तो, निर्णय सती बुद्धि करती है, असती कभी नहीं। अतः रावण को सहज भाव से दुर्योधनादि कंस की श्रेणी में रखना अयुक्तिक है।

इसलिये आज रावण को ब्राह्मण वंशीय कहकर महिमा मण्डित पण्डित वेदज्ञ कहकर कालिक परम्परा में जातिगत आक्षेप ठीक नहीं। शास्त्र सन्त और सद्गुरु जात्यापेक्षी नहीं हैं।सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म ही वस्तुतः ब्राह्मणत्व है,जाति नहीं।

नैव जातिः ब्राह्मणत्वम्, अपितु ब्रह्मवित्वं ब्राह्मणत्वम्। सर्वोपकारित्वं ब्राह्मणत्वम्।

इसलिये जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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सद्गुरु संग पवाइये

नारायण नारायण नारायण कामलीलासक्त हम जैसे लोग जब, वेद देव सन्त समर्थ सद् गुरु चरणाश्रय ग्रहण करें तभी सन्मार्ग मिले।अत्यन्तवैराग्यवान् गुरुभगवान् ही कामादि हटायेंगे, जिनका कि हट चुका है। विषयविष बन्ध निर्मुक्तसाधु भक्त का पादाश्रय ही स्वर्गापवर्गासक्त भाव हटायेगा। जगत् का मान सम्मान पद पदार्थों की रुचि तो बारम्बार पार्थिव देहों में जीव को डालेगा ही।कालकर्म और ऐन्द्रिक ग्राहकों ने मुझे आजन्म घेर लिया है।जब मैं उनके हाथ बिकना,स्वीकार नहीं करता, तब वे मुझे बाँधकर,दाम दिखाते हैं।मतलब कि जैसे तैसे लालच दिखाकर अपने वश में करना चाहते हैं।कालकरमइन्द्रियविषय गाहकगन घेरो।हौं न कबूलत,बाँधि कै मोल करत करेरो – विनयपत्रिका पद 146

हे प्रभु जहाँ सत्संग कथा माधव की होती है, वहाँ मन जाता ही नहीं।लोभ मोहादि से मुझे प्रेम है।जहँ सतसंग कथा माधव की, सपनेहुँ करत न फेरो।लोभ मोह मद काम कोह रत,तिन्ह सों प्रेम घनेरो -वही पद -143

इसलिये हे नाथ साधुसद्गुरु संग देकर संसारद्वन्द्व भगाइये और अपनेचरणकमलों में ही राग दे दीजिये, तभी पार्थिव विकृति हटेगी और स्वस्वरूप की अवगति होगी,अन्यथा मैं संसार सागर में बारम्बार डूब ही जाता हूँ- सेवत साधु द्वैत भय भागै।श्रीरघुबीर चरन लय लागै।।देह जनित बिकार सब त्यागै।तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै।।

वही 136/11स्वप्न में भी द्वैतदर्शन में सुख नहीं है, सुखाभास छोड़कर।ब्रह्मविद् ब्राह्मण देवता गुरु हरि सन्तों के बिना संसार से पार पाना असम्भव है-सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत दरसन,बात कोटिक को कहै।द्विज देव गुरु हरि संत बिनु संसार पार न पाइये ।यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये-वही 136/12

अतः हम मायाधीन जीव।मायाधीश आप सिवासीव।हमें चाहे जैसा मान अपनाइये। विरागीसज्जन सद्गुरु संग पवाइये।

।हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।http://shishirchandrablog.in

विषयविषसम

नारायण नारायण नारायण अत्यन्त वैराग्य सम्पन्न महापुरुष का चरणाश्रय ही वैराग्य दे सकता है। यस्य निर्विषयं मनः और अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः जैसे वाक्य कथन में मानदण्ड हैं।विवेकवैराग्यख्यात जन ही वैराग्य बाँटते हैं, लेकिन किसी किसी सौभाग्यशाली को,गुरुहरि कृपा ही कारणता दीखती है, विषयविष के परित्याग में।ऐसे लोगों का जीवन धन्य धन्य है, जिन्हे हरिकथासंग प्राप्त हो।

क्योंकि हरिकथा इस कराल कलिकाल में मरणधर्मा मानव की अमरता है। तव कथामृतं तप्तजीवनम्।और वे धन्यातिधन्य हैं, जिन्हे पूज्य गोस्वामी जी जैसे सन्तों की वाणी में तृप्ति और आनन्दानुभूति होने लगे।ऐसे सन्तचरित्र और उनकी वाणी का प्रसाद, वर्तमान समय में तो, कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः इत्यादि व्यासवचन की सत्यता सिद्ध करते हैं।

भक्तसन्तों की उपस्थिति में यह स्वतः ही ध्रुव प्रमाण है।रमाविलासविलास राम अनुरागी तजत वमन इव नर बड़ भागी एवं गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं राम कृपा करि चितवा जाही जैसी वैराग्य विवेकसम्पन्नता हरिगुरुकृपा ही देती है। जिससे इस मायिक संसार में सुखाभासता की चरम प्रतीति होने लगती है। आपातरमणीय संसार के भोगों की निःसारता और सर्वकारणकारण भगवान् की सच्चिदानन्दमयता में सतत आत्मिक अनुभूति आने लगती है।

जब नेति नेति वह,,अपनी आत्मा में आनन्दनिर्झरझर्झर झरने लगा, तो चरम प्राप्य तो यही है।एक विशेष बात यह भी कि,मायिक उपाधियों से मुक्त परमपरमात्मा की अपरोक्षानुभूति मायोपाधि शून्यता दशा में ही अनुभवैक गम्य है। क्योंकि- आप मायाधीश मायाधीन जीव हम। करो निर्मल चित्त तुच्छ विषयविषसम।

हरिःशरणम्।। गुरुः शरणम्।।

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