शिक्षक/गुरु

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का समग्र जीवन प्रतिकूलता में अनुकूलता की अनुभूति है।

सौभाग्य से और वैदिक आचार व्यवहार के पालन से कोई सौभाग्यशाली श्रीराचरित्र का अनुसन्धान करे,तो वह मनुष्य और देवतुल्य हो जायेगा।

प्रथम शिक्षा आचरण द्वारा शिक्षण है,जिसे प्रभु राम ने पालन करके दिखाया।

पल-पल प्रभु का अविस्मृत स्मरण बना रहे, जिससे, अहंता, ममता की खटाई मनुष्यता अवरुद्ध न कर सके।

सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,परमात्मा ही विराजते हैं।अतः सदा तद्भावभावितः रहना प्रत्येक मनुष्य प्राणी का कार्य है।

पन्द्रहवीं शती में बंगाल की पवित्र धरती पर, अवतीर्ण परम पूज्य परमहंस श्रीरामकृष्ण देव का मानना था,कि प्रत्येक शिक्षक को आत्मिक अनुभूति अवश्य ही करनी चाहिए,क्योंकि इसके बिना, मर्यादित आचरण सम्भव नहीं है।
और प्रत्येक शिक्षक/आचार्य से चरित्र शिक्षण ही ऐदं प्राथम्येन अपेक्षित होता है।
सद्गुरु/शिक्षक/परमात्मा एक कोटिक हैं। वह कौन शिक्षक है,जिसे आत्म अनुभूति न हुई।

आते न वे परमेश जो ,गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

सभी देवतुल्य शिक्षक और शिक्षकधर्मा
आत्मीय जनों को सन्तत सादर नमन।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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