सकलसुखसङ्गो विजयते

कृष्ण चेतना ही प्रत्येक कण-कण और प्राणिमात्र में है।अनुभूति कराने वाले साधक के मिले बिना उसका अनुभव असम्भव है। हमारी नाना जन्मो योनियों की संसारी वासना को सिद्ध साधक क्षण भर में,हटाकर मायाबन्ध को नष्ट कर देता है, जैसे परमहंसदेव श्रीरामकृष्ण ने बहुतों का किया।और आज भी अनुभवप्रत्यक्ष सिद्ध सद्गुरु किसी जीव को उसके वेदाचरण से अभिभूत होकर,उसका मायिक बन्धन तोड़ रहे हैं, तोड़ते आगे भी रहेंगे।आवश्यकता केवल वेद,महापुरुष और सन्त आचरित मार्ग पर चल पड़ने की है।जैसा -जैसा श्रेष्ठ जन आचरण करते चलते हैं, उसी तरह बाद में उत्पन्न लोगों को भी करना ही चाहिए।ऐसे महत्पुरुष जो चलने का मार्ग दिखायें,उसी का अनु करण हो।यद् यद् आचरति श्रेष्ठः,तत् तत् एव इतरः जनः।स यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तद् अनुवर्तते।। -ब्रह्माण्डगुरु श्रीकृष्ण।चेतनाशक्ति, चेतनाधर्ता की है। जब सबमें वही है तब अलग क्या है। बिनु सत्संग न हरिकथा। मतलब कि हरि कथा ही सत्संग है। और सत्संग अमृत के बिना अनेक जन्मों की संसार वासना जायेगी नहीं- जौ कछु काल करिय सतसंगा। जब मन से बे मन से नाम स्मरणकीर्तन उच्चारण होता है, और भगवत्कथा पीयूषरस का पान होता है, तब भगवान् /भगवती स्वयं जीव के उद्धार का संकल्प करते हैं। अतः हमें अहंकार मात्र ही है, कि हम अमुक साधन करके भोग/मोक्ष पा लेंगे।गुरोराज्ञा गरीयसी जान कर जीव मात्र को बड़ों के आदेश का पालन करना चाहिए।ऐसे ही सन्त सद्गुरु और बड़ों की वैराग्य पूर्ण रहनी-सहनी का समादर करके ही तमसो मा ज्योतिः गमय प्राप्य है। यही संसार यात्रा का सुगम मार्ग और लक्ष्य पर ले जाने की सरणि है।शरण्य,भगवान् हैं। प्रत्येक मनुष्य जीव अपनी श्वासप्रश्वास में उनका अनुभव कर सकता है।लेकिन यही अनुभव मात्र सद्गति नहीं दे सकता। हरि गुरु सन्त की संगति ही भवबन्धन भंग का एकमेवोपाय है।

सतां सङ्गःसङ्गः भवविभवभङ्गः भुवि नृणाम्।

समाकृष्टः जातः सकलसुखसङ्गो विजयते।

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।

https://shishirchandrablog.com

शिक्षक/गुरु

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का समग्र जीवन प्रतिकूलता में अनुकूलता की अनुभूति है।

सौभाग्य से और वैदिक आचार व्यवहार के पालन से कोई सौभाग्यशाली श्रीराचरित्र का अनुसन्धान करे,तो वह मनुष्य और देवतुल्य हो जायेगा।

प्रथम शिक्षा आचरण द्वारा शिक्षण है,जिसे प्रभु राम ने पालन करके दिखाया।

पल-पल प्रभु का अविस्मृत स्मरण बना रहे, जिससे, अहंता, ममता की खटाई मनुष्यता अवरुद्ध न कर सके।

सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,परमात्मा ही विराजते हैं।अतः सदा तद्भावभावितः रहना प्रत्येक मनुष्य प्राणी का कार्य है।

पन्द्रहवीं शती में बंगाल की पवित्र धरती पर, अवतीर्ण परम पूज्य परमहंस श्रीरामकृष्ण देव का मानना था,कि प्रत्येक शिक्षक को आत्मिक अनुभूति अवश्य ही करनी चाहिए,क्योंकि इसके बिना, मर्यादित आचरण सम्भव नहीं है।
और प्रत्येक शिक्षक/आचार्य से चरित्र शिक्षण ही ऐदं प्राथम्येन अपेक्षित होता है।
सद्गुरु/शिक्षक/परमात्मा एक कोटिक हैं। वह कौन शिक्षक है,जिसे आत्म अनुभूति न हुई।

आते न वे परमेश जो ,गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

सभी देवतुल्य शिक्षक और शिक्षकधर्मा
आत्मीय जनों को सन्तत सादर नमन।

http://www.shishirchandrablog.in