मोहबन्धन स्वयं टूटा है किसी का, मिलें सद्गुरु बन्ध टूटे,टूटता है, जिस किसी का।
आते न वे परमेश जो गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।
ईश, गुरु में भेद क्या होता कभी है।आत्मदर्शन तुष्ट होवे जीव जब देखे तभी है।
मोह का तम शीर्ण हो चुकता समझ लो।
गुरुब्रह्मासूर्य दीपक है चमकता जब समझ लो।
सन्त वैदिक आचरण करते रहो बस।
सत्य संकल्पित पथों पर चलो हँस हँस।
ध्यान रखते फाँस कटते,कट चुके बन्धन कृपातः।
गुरु देव ही समझो सदा,शिवविष्णुधातः।
हम हमारा, तुम तुम्हारा, भाव यह,जब तक चलेगा।
सृजन विसृजनबन्ध भी चलता रहेगा। कर्म बनते तब तलक हैं, पापमूलक,पुण्यमूलक।
नरक स्वर्गादिक रहेंगे तब तलक ही भोगमूलक।
जय पराजय दुःख सुख के पार जाना ही पड़ेगा।
ईश गुरु चरणारविन्दों में सतत जब गिर, अड़ेगा।
इसलिये आदर्श सद्गुरु,दर्पणों में दर्प धो लो।
इसलिये आदर्श सद्गुरु वचन अमृत प्रेम घोलो।।
इसलिये तुम राम की गंगा बहाओ।
नाम नद में डूबकर उस पार जाओ।।
नाम से वह राम चिन्मय ठहर जाता।
नित्यलीला शाश्वती करता रता है।।
और अन्तिम धाम की प्रभुपद निराली।
पा गया पाकर न लौटा हाँथ खाली।।
जो अकुण्ठित सच्चिदानँद नन्दनन्दन।
गुरुकृपा माध्यम मिलें आनन्द के घन।।
गुरुः शरणम् । हरिःशरणम्।